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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

४२४ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण || मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण सूक्ष्मातिसूक्ष्मम् | पो०त० ३३ || स्वरूपाभूत आनन्द. | कं०रु० ३५ सूक्ष्मभुक् चतुरस्रपाथ | ना०परि० ८.१३ || स्वरूपानुसंधान .. | संन्या० २.७५ सूचनात्सूत्रम् | ना०परि० ३.८२ || स्वरेण संन्धयेद्योगम् | ब्र०त्रि० ७ सूचनात्सूत्रमित्याहुः | ब्रह्म० ७ || स्वल्पोऽपि योगो | आ०बो० २.२९ सूत्रमन्तर्गतम् | ब्रह्म०१०, प०ब्र०११ || स्वव्यतिरिक्तम् | संन्या० २.७६ सूत्रमन्तर्गतं येषाम् | ना०परि० ३.८५ || स्वस्तिके गोमुखम् | जा०द० ३.१ सूर्यमण्डलमध्योऽथ | ब्र०वि० ७ || स्वस्तिक गोमुख ... | शाण्डि० १.३.१ सूर्यस्य ग्रहणम् | ब्र०वि० ५७ || स्वस्य क्रमेणैव | प०प० ३ १ मूर्यालोकपरिस्यन्द . | शाण्डि० १.७.२६ || स्वस्वरूपतः | ना०परि० ९.२३ 'मेर्वाधिः परिणोयैनम् | ना०परि० ६.२२ || स्वात्मनेव | आत्म० १२ सोऽग्रे भूतानाम् | सुबा० १.४ || स्वात्मन्यारोपित ... | अध्या० ११ सोऽन्ते वैश्वानरो | सुबा० २.४ || स्वात्मन्येव सदा | अध्य० ४ सोमसूर्यद्वयोर्मध्ये | शाण्डि० १.७.४२-क || स्वात्मवत्सर्वभूतेषु | जा०द० १.१५ सोऽविमुक्तः प्रतिष्ठित् | जाबा० २.२ || स्वानुभूत्या स्वयम् | अध्य० ६५ सोऽहमर्कः परम् | म० वा० ११ || स्वेनावृतं सर्वमिदं | ना०परि० ९.२० सोऽहं ब्रह्म | जा०द० १०.६ || स्वैरं स्वैरविहरणम् | अव० ७ सौनालबीज ... | सुबा० १६.१ || हंस एव परम् | ब्र०त्रि० ६१ स्त्रीणामबाञ्छतेशास्य | ना०परि० ४.२८ || हंस ज्योतिरनूपम्यम् | ब्र०वि० ६४ स्थानत्रयव्यतीतोऽहम् | ब्र०वि० १०८ || हंसविद्यामृते | ब्र०वि० २६ स्थानानि स्थानिभ्यो | सुबा० ५.१ || हंसः शुचिषद्सुः | ना०परि० ५.१० स्थावरं जङ्गमम् | संन्या० २.११० || हंसे हंसेति यो | ब्र०वि० ३४ स्थिराङ्गमद्रुतम् | क्षुरि० ६ || हंसो जटाधारी | ना०परि०५.१४,, संन्या० २.२६ स्थूलदेहगता | आ०बो० २.२३ || हयवरनकागरूढम् | ज०द० ८.३ स्नाने त्रिक्षपणं प्रोक्तम् | ना०परि० ४.२२ || हस्तमेवाप्येति | सुत्रा० १.७ स्नानं पानम् .. नदीपुलिशायो | कं०रु० ७ || हस्तावधाव्यत्वम् | सुबा० ५.१९ स्नानं पानम् .. स्तूयमानो | कुण्डि० १२ || हस्ती जामो | जा०द० ३.६-२ स्पष्टकामो जगद्योनि | पैङ्ग० १.७ || हितास्ति पशोरामम् | ना०परि० ३.६७ स्वचित्तनिर्जिता | संन्या० २.७१ || हिरण्यगर्भाधिक्षित .. | पैङ्ग० १.६ स्वदेहमनिनिर्मोचो | जा०द० १.२७ || हिरण्य ज्योतिः | सुबा० २.३ स्वदेशस्य | कुण्डि० २२ || हृत्पद्ममध्ये | आ०बो० १.६ स्वप्नेऽपि यो हि | ना०परि० ५.१२ || हृत्पुण्डरीकमध्ये | मैत्रे० १.१२ स्वप्ने स जीवः | कैव० १२ || हृत्पुण्डरीकं विरजं | कैव० ६ स्वप्रकाशचिदानन्दम् | ब्र०वि० २१ || हृदयं निर्मलम् | पैङ्ग० ४.१४ स्वप्रकाशमधिष्ठानम् | अध्या० ८ || हृदयस्य मध्ये | सुबा० ४.१ स्वप्रकाशे परानन्दे | आ०बो० २.२६ || हृदयादिकण्ठ ... | शाण्डि० १.७.१३-२ स्वमसङ्गमुदासीनम् | अध्या० ५१ || हृदाकाशेचिदादित्यः | मैत्रे० २.१४ स्वमुखेन | जा०द० ४.१३ || हृदिस्था देवता | ज्ञान० ४ स्वमेव सर्वतः | कुण्डि० २७ || हीनंधा ज्ञानविज्ञाने | ना०परि० ४.१२ स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः | अध्या० २० स्वयौनाबुपशान्तस्य | मैत्रे० १.८ ॥ इति मन्त्रानुक्रमणिका समाप्ता ॥