१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ खण्ड २२ मन्त्र ५ १०९ तदेष श्लोकः । यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति ॥ ३ ॥ इस सम्बन्ध में यह श्लोक है- उपर्युक्त साम में पाँच प्रकार से तीन-तीन (त्रिक) स्वरूपों का वर्णन है। उनसे श्रेष्ठ उनके अतिरिक्त और कोई साम नहीं है ॥ ३ ॥ यस्तद्वेद स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति । सर्वमस्मीत्युपासीत तद्व्रतं तद्व्रतम् ॥ ४ ॥ जो साधक उसे जानता है, वह सब कुछ जानता है। उसे सभी दिशाएँ (सम्पूर्ण प्रकृति) बलि (भोगों का अनुदान) देती हैं। हम ही सब कुछ हैं, यह मानकर साधक उपासना करे- यही उसका व्रत है ॥ ४ ॥ ॥ द्वाविंशः खण्डः ॥ विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान्सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥ साम के 'विनर्दि' नामक उद्गान का वर्णन करते हैं, वह पशुओं के लिए हितकारी है। वह अग्नि देवता से सम्बन्धित उद्गान है। प्रजापति का उद्गान स्पष्ट वर्णनीय नहीं है और सोम का उद्गान स्पष्ट वर्णनीय है। वायु देवता का उद्गान मृदु एवं मधुर है। इन्द्र देवता का उद्गान मधुर एवं पराक्रम साध्य है। बृहस्पति देवता का उद्गान क्रौञ्च पक्षी के सदृश है। वरुण देव का उद्गान फूटे काँसे के पात्र सदृश है। ये सभी उद्गान सेवनीय हैं, परन्तु वरुण देवता से सम्बद्ध उद्गान त्याज्य है ॥ १ ॥ अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत्स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २ ॥ हम देवों के लिए अमरत्व का उपाय करें। पितरों के लिए स्वधा का, मनुष्यों के लिए इष्ट वस्तुओं का, पशुओं के लिए तृण एवं जल का, यजमान के लिए स्वर्ग लोक का और अपने लिए अन्न का उपाय करें- इस प्रकार इनका मन से चिन्तन करते हुए प्रमाद रहित होकर स्तुति करें ॥ २ ॥ सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मानः सर्व ऊष्माणः प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं यदि स्वरेषूपालभेतेन्द्रः शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति वक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥ समस्त स्वर इन्द्रदेव की आत्मा हैं। सभी ऊष्म वर्ण देव प्रजापति की आत्मा हैं, सभी स्पर्श वर्ण मृत्यु देव की आत्मा हैं। यदि कोई व्यक्ति ऐसे उद्गाता के स्वर उच्चारण में दोष बताए, तो वह उससे कहे कि 'मैं इन्द्रदेव के आश्रय में था, वही आपको इसका उत्तर देंगे' ॥ ३ ॥ अथ यद्येनमूष्मसूषालभेत प्रजापतिः शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिपेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येनःस्पर्शेषूपालभेत मृत्युः शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिधक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥ यदि कोई पुरुष उद्गाता के ऊष्मवर्णों के उच्चारण में दोष कहे, तो उससे वह कहे कि 'मैं प्रजापति देव के आश्रय में था, वही आपको नष्ट करेंगे, यदि कोई पुरुष स्पर्श वर्णों के उच्चारण में दोष प्रकट करे, तो वह उससे कहे कि - 'मैं मृत्यु देवता के आश्रय में था, वे ही आपको भस्म करेंगे' ॥ ४ ॥ सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्व ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशेनानभिनिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥