भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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सभी स्वर घोषपूर्वक और बलपूर्वक उच्चारण किये जाने चाहिए। उनका उच्चारण करते समय कहे- हम इन्द्रदेव में पराक्रम की स्थापना करते हैं। सभी ऊष्मवर्ण बिना ग्रहण किये और बिना निकाले ही प्रयत्नपूर्वक उच्चारण किये जाते हैं। उनके उच्चारण के समय कहे - हम प्रजापति को अपनी आत्मा देते हैं। सभी स्पर्शाक्षर एक दूसरे में मिलाये बिना ही उच्चारण करते हुए कहे-'हम मृत्युदेव से अपने को छुड़ाते हैं'॥ ॥ त्रयोविंशः खण्डः ॥ त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्य- कुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मस१स्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥ धर्म के तीन स्कन्धों (आधार स्तम्भों) के विषय में वर्णन करते हैं। धर्म के तीन स्कन्ध हैं; यज्ञ, अध्ययन और दान-यह पहला स्कन्ध है। तप दूसरा स्कन्ध है। आचार्य कुल में साधनारत ब्रह्मचारी आचार्य कुल में अपने शरीर को तितिक्षा द्वारा क्षीण कर देता है, यह तीसरा स्कन्ध है। ये सभी पुण्य लोकों के अधिकारी होते हैं और ब्रह्म में स्थित अमृतत्व को प्राप्त करते हैं ॥ १ ॥ प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या संप्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि संप्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति ॥ २ ॥ प्रजापति देव लोकों का सार ग्रहण करने के उद्देश्य से तप करने लगे। तप के प्रभाव से लोकों से त्रयी विद्या-ऋक्, यजु एवं साम की उत्पत्ति हुई। पुनः तप के प्रभाव से उस त्रयी विद्या से भूः, भुवः एवं स्वः- ये अक्षर प्रस्रवित हुए ॥ २ ॥ तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः संप्रास्रवत्तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृष्णान्येवमोंकारेण सर्वा वाक् संतृण्णोंकार एवेद१ सर्वमोंकार एवेद१ सर्वम् ॥ ३ ॥ पुनः तप के प्रभाव से उन्होंने तीनों अक्षरों का सार ॐकार प्राप्त किया। जिस प्रकार शङ्कुओं (नसों) द्वारा सभी पत्ते व्याप्त रहते हैं, उसी प्रकार ॐकार द्वारा सम्पूर्ण वाणियाँ व्याप्त हैं। ॐ कार ही यह सम्पूर्ण (जगत्) है। ॐ ही यह सम्पूर्ण (आकाश) है ॥ ३ ॥ ॥ चतुर्विंशः खण्डः ॥ इस खण्ड में यज्ञ के तीन (प्रातः, मध्याह्न और सायं) सवनों के माध्यम से जीवन के तीन कालों में किए जाने वाले साधना पुरुषार्थ का उल्लेख ऋषि ने किया है। ब्रह्मचर्य आश्रम में अध्ययन आदि पूर्ण होने पर जीवन का प्रारंभ सद्गृहस्थ से किया जाता है। इसीलिए प्रथम सवन में गार्हपत्याग्नि से साधना प्रारंभ की जाती है- ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद्वसूनां प्रातःसवन१ रुद्राणां माध्यन्दिन१ सवनमादित्यानां च विश्वेषां च देवानां तृतीयसवनम् ॥ १ ॥ (अब यज्ञ के सम्बंध में कहते हैं।) ब्रह्मवादी कहते हैं कि प्रातःकाल का सवन वसुगणों का है, मध्याह्न सवन रुद्रगणों का है और तृतीय सवन आदित्य गणों तथा विश्वेदेवों का है ॥ १ ॥ क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात्कथं कुर्यादथ विद्वान्कुर्यात् ॥ २ ॥ फिर यजमान का लोक कहाँ है ? जो यजमान अपने पुण्यलोक को नहीं जानता, वह यज्ञ क्यों करेगा ? अतः यज्ञ के फलस्वरूप पुण्यलोक को जानकर ही यज्ञ करना चाहिए ॥ २ ॥