१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ खण्ड ३ मन्त्र १ १९३ ॥ अथ तृतीयोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवश्रोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥ (ॐकार रूप) यह आदित्य ही देवों का मधु है । द्युलोक वह तिरछा बाँस है, जिससे छत्ता लटकता है । अन्तरिक्ष छाता है और किरणें मधु-मक्खियों के बच्चों की तरह हैं ॥ १ ॥ तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्यः । ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः ॥ २ ॥ इस आदित्य की पूर्व दिशा की जो किरणें हैं, वे छत्तों के पूर्वीय छिद्र हैं। ऋचाएँ ही मधुमक्खियाँ हैं, ऋग्वेद ही पुष्प हैं, सोम आदि अमृत रूप जल तत्त्व हैं ॥ २ ॥ एतमृग्वेदम्अभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यँ रसोऽजायत ॥ ३ ॥ उन ऋचाओं ने ही ऋग्वेद को अभितप्त किया, उस अभितपन से यश, तेजस्, इन्द्रिय-शक्ति, पराक्रम अन्नादि रस उत्पन्न हुआ ॥ ३ ॥ तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य रोहितँ रूपम् ॥ ४ ॥ वह रस विशेष रूप से क्रियाशील हुआ। उसने आदित्य के पूर्व भाग में आश्रय ले लिया। यह जो आदित्य का लाल रंग दिख रहा है, वही वह रस है ॥ ४ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूंष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥ अब आदित्य की जो दक्षिण दिशा की ओर किरणें हैं, वे इस छत्ते की दक्षिणवर्ती मधु नाड़ियाँ हैं। यजुर्वेद की कण्डिकाएँ ही मधुमक्खियाँ हैं, यजुर्वेद ही पुष्प है और (सोमादि) अमृत ही जल है ॥ १ ॥ तानि वा एतानि यजूंष्येतं यजुर्वेदम्अभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यँरसोऽजायत ॥ २ ॥ यजुर्वेद की कण्डिकाओं ने यजुर्वेद को अभितप्त किया। उस अभितपन से यश, तेजस्विता, इन्द्रिय शक्ति, पराक्रम और अन्नादि रस उत्पन्न हुए ॥ २ ॥ तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्लँ रूपम् ॥ ३ ॥ वह रस विशेष रूप से क्रियाशील हुआ। उसने आदित्य के दक्षिण भाग का आश्रय लिया। यह जो आदित्य का श्वेत रूप दृष्टिगोचर हो रहा है, यह वही है ॥ ३ ॥ ॥ तृतीयः खण्डः ॥ अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥ अब जो आदित्य के पश्चिमी छोर की किरणें हैं, वे ही पश्चिम ओर की मधु नाड़ियाँ हैं। साम मन्त्र ही मधुमक्खियों के रूप में हैं, सामवेद ही पुष्प हैं और (सोमादिरूप) अमृत ही जल है ॥ १ ॥