भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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१२० छान्दोग्योपनिषद् वह जो विराट् ब्रह्म है, वह पुरुष के बहिरंग आकाश रूप में है और जो भी वह पुरुष के बहिरंग आकाश रूप में है, वही पुरुष के अन्तरङ्ग आकाश रूप में है। जो भी पुरुष के अन्तरङ्ग आकाश रूप में है, वही पुरुष के अन्तःहृदय के अन्तरङ्ग आकाश रूप में है। वह अन्तरङ्ग आकाश सर्वदा पूर्ण और अपरिवर्तनीय (नित्य) है। जो साधक इस प्रकार उस ब्रह्म स्वरूप को जानता है, वह सर्वदा पूर्ण और अपरिवर्तनीय (नित्य) सम्पदाएँ (विभूतियाँ) प्राप्त करता है॥ ७-९॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ्‌सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेतत्तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥ उस अन्तःहृदय के पाँच देवों से सम्बन्धित पाँच विभाग हैं। जो इसका पूर्ववर्ती विभाग है, वह प्राण है, वह चक्षु है, वह आदित्य है, वह तेजस् है और वह अन्नादि है। इनकी उपासना करने योग्य है। जो साधक इस प्रकार जानकर इनकी उपासना करता है, वह तेजस्वी और अन्न की शक्ति से युक्त होता है॥ १॥ अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रं स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत श्रीमान्यशस्वी भवति य एवं वेद ॥ २ ॥ जो इसका दक्षिणवर्ती विभाग है, वह व्यान है, श्रोत्र है, चन्द्रमा है, श्री-सम्पदा है एवं यश है। इनकी उपासना करने योग्य है। जो साधक इस प्रकार जानकर इनकी उपासना करता है, वह विभूतिवान् और यशस्वी होता है॥ २॥ अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः सोऽपानः सा वाक् सोऽग्निस्तदेतद्ब्रह्मवर्चसमन्ना- द्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ ३ ॥ जो इसका पश्चिमी विभाग है, वह अपान है। वह वाणी है, वह अग्नि है, वह ब्रह्मतेज है एवं वह अन्नादि है। इनकी उपासना करने योग्य है। जो साधक इस प्रकार जानकर इनकी उपासना करता है, वह ब्रह्मतेज एवं अन्न की शक्ति से युक्त होता है॥ ३॥ अथ योऽस्योदङ्‌सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेतत्कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान्व्युष्टिमान्भवति य एवं वेद ॥ ४॥ जो इसका उत्तरी विभाग है, वह समान है। वह मन है, वह पर्जन्य है, वह कीर्ति और वही व्युष्टि (शारीरिक आकर्षण) है। इनकी उपासना करने योग्य है। जो साधक इस प्रकार जानकर इनकी उपासना करता है, वह कीर्तिमान् और व्युष्टिमान् (कान्तियुक्त काया वाला) होता है॥ ४॥ अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्यु- पासीतौजस्वी महस्वान्भवति य एवं वेद ॥ ५॥ इसका जो ऊर्ध्व विभाग है, वह उदान है। वह वायु है, वह आकाश है, वह ओज है और वही महः है। इनकी उपासना करने योग्य है। जो साधक इस प्रकार जानकर इनकी उपासना करता है, वह ओजस्वी और महस्वान् (महानतायुक्त) होता है॥ ५॥ ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेद ॥ ६ ॥