१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ खण्ड १४ मन्त्र ४ १२१ वे पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोक के द्वारपाल हैं। जो पुरुष स्वर्गलोक के द्वारपालों इन पञ्च ब्रह्मपुरुषों को जानता है, उसके कुल में वीर बालक उत्पन्न होता है और वह स्वर्गलोक को प्राप्त करने वाला होता है। अतः स्वर्गलोक के द्वारपालों इन पाँच ब्रह्मपुरुषों को जानकर इनकी उपासना करने योग्य है ॥ ६ ॥ अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिस्तस्यैषा दृष्टिः ॥ ७॥ जो इस स्वर्गलोक से ऊपर यह परम ज्योति प्रकाशित होती है, जो इस सम्पूर्ण विश्व के पृष्ठ पर सबके ऊपर प्रकाशित होती है, वही ज्योति पुरुष की अन्तः ज्योति के सदृश है ॥ ७ ॥ यत्रैतदस्मिञ्छरीरे संस्पर्शेनोष्णिमानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनदमिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ उस ज्योति के दर्शन का उपाय यह है कि स्पर्श द्वारा शरीर में उष्णता का ज्ञान होता है और उसके श्रवण का उपाय यह है कि कानों के मूँदने से रथ ध्वनि, बैल का डकारना और प्रदीप्त अग्नि के शब्द के सदृश निनाद होता है, वह ज्योति दर्शनीय और श्रवणीय है। उसकी इस प्रकार उपासना करने योग्य है। जो साधक इस प्रकार जानकर उसकी उपासना करता है, वह शोभावान् और कीर्तिवान् होता है ॥ ८ ॥ ॥ चतुर्दशः खण्डः ॥ सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत। अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथा क्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ॥ १ ॥ यह सम्पूर्ण जगत् निश्चय ब्रह्मस्वरूप है, यह उसी से उत्पन्न होता, उसी में लय होता, उसी से संचालित होता है। राग-द्वेष से दूर शान्त भाव से उसी की उपासना करनी चाहिए। निश्चय ही पुरुष संकल्पमय है। इस लोक में पुरुष जैसे संकल्प धारण करता है, वैसा ही मरने के बाद होता है, अतः पुरुष को सत्संकल्प करने चाहिए ॥ १ ॥ मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥ २ ॥ वह परमात्मा प्राणस्वरूप, मनोमय शरीर वाला, देदीप्यमान, सत्संकल्पवान् , आकाश सदृश विराट् स्वरूप वाला, सम्पूर्ण जगत् का रचयिता, सम्पूर्ण कामनाओं वाला, सम्पूर्ण गन्ध एवं रस सम्पन्न, सर्वत्र संव्याप्त, वाणी रहित तथा भ्रमशून्य है ॥ २ ॥ एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान्व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद्वा श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वा एष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥ ३ ॥ हृदय गुहा में अवस्थित यह आत्मा धान से, जौ से, सरसों से, श्यामाक (साँवाँ) से या श्यामाकतण्डुल से भी सूक्ष्म है तथा हृदय गुहा में स्थित यह आत्मा पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक या इन सब लोकों से भी विराट् है ॥ ३ ॥ सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकि- त्सास्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥ ४ ॥