भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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१२२ छान्दोग्योपनिषद् जो सम्पूर्ण जगत् के रचयिता, सम्पूर्ण कामनाओं वाला, सम्पूर्ण गन्ध एवं रस से सम्पन्न, सर्वत्र संव्याप्त, वाणी रहित तथा भ्रमशून्य है, वह आत्मा हृदय गुहा में अवस्थित है, यही ब्रह्म है। शरीर छोड़कर जाने में हम इसी को प्राप्त होंगे, ऐसा जिसका निश्चय है और इसमें वह संशय नहीं करता, तो वह निश्चय ही ब्रह्मतत्त्व को प्राप्त कर लेता है, ऐसा शाण्डिल्य का कथन है॥ ४ ॥ ॥ पञ्चदशः खण्डः ॥ अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिर्बुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलः स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन्विश्वमिदं श्रितम् ॥ १ ॥ वह कोश जिसका उदर अन्तरिक्ष है, जिसका मूल पृथ्वी है, जो कभी जीर्ण नहीं होता। दिशाएँ इसके कोणों के रूप में हैं, आकाश इसका ऊपर का छिद्र है। वह कोश वसुधान (वसु=प्राणों की स्थापना का स्थल) है। उसी में यह सम्पूर्ण विश्व अवस्थित है॥ १ ॥ तस्य प्राची दिक् जुहूनाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदं रुदम् ॥ २ ॥ उस कोश की पूर्व दिशा 'जुहू' नाम की है, दक्षिण दिशा 'राज्ञी' नाम की है तथा उत्तर दिशा 'सुभूता' नाम की है। उन दिशाओं के पुत्र रूप वायु हैं। इस प्रकार जो पुरुष वायु को दिशापुत्र के रूप में जानता है, वह पुत्र प्राप्ति के निमित्त रोदन नहीं करता। चूँकि हम दिशाओं के पुत्ररूप में वायु को जानते हैं, अतः हम पुत्र प्राप्ति के निमित्त न रोएँ॥ २ ॥ अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना प्राणं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भूः प्रपद्येऽमुना- ऽमुनाऽमुना भुवः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना स्वः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना ॥ ३ ॥ मैं पुत्र तथा परिवार के साथ अक्षय (अन्नमय) कोश के आश्रय में जाता हूँ। मैं पुत्र तथा परिवार के साथ प्राणमय कोश के आश्रय में जाता हूँ। मैं पुत्र तथा परिवार के साथ भूः अर्थात् मनोमय कोश के आश्रय में जाता हूँ। मैं पुत्र तथा परिवार के साथ भुवः अर्थात् विज्ञानमय कोश के आश्रय में जाता हूँ। मैं पुत्र तथा परिवार के साथ स्वः अर्थात् आनन्दमय कोश के आश्रय में जाता हूँ ॥ ३ ॥ स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच तमेव तत्प्रापत्सि ॥ ४ ॥ जब हमने कहा कि हम प्राण के आश्रय में हैं, तो इसका आशय यह है कि ये समस्त भूत (तत्त्व) प्राण ही हैं, हम उसी के आश्रय में हैं ॥ ४ ॥ अथ यदवोचं भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्ये इत्येव तदवोचम् ॥ ५ ॥ जब हमने कहा कि हम भूः के आश्रय में हैं, तो इसका आशय यह है कि हम पृथ्वी के आश्रय में हैं, हम अन्तरिक्ष के आश्रय में हैं, हम द्युलोक के आश्रय में हैं ॥ ५ ॥ अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ६ ॥ तदनन्तर जब हमने कहा कि हम भुवः के आश्रय में हैं, तो इसका आशय यह है कि हम अग्नि के आश्रय में हैं, हम वायु के आश्रय में हैं, हम आदित्य के आश्रय में हैं ॥ ६ ॥