१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ खण्ड १८ मन्त्र ५ १२५ आदित्यप्रत्नस्य रेतसः । उद्वयन्तमसस्परि ज्योतिः पश्यन्त उत्तरꣳस्वः पश्यन्त उत्तरं देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तममिति ज्योतिरुत्तममिति ॥ ७॥ [ प्रथम ऋचा पूर्णतः इस प्रकार है- 'आदित्यप्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः पश्यन्ति वासरम्। परो यदिध्यते दिवि।' ( आनन्दगिरिकृत टीका से ) इसका अर्थ इस प्रकार है- उस पुरातन पुरुष का तेज ही सर्वत्र संव्याप्त है। उसी का प्रकाश हम सर्वत्र संव्याप्त देखते हैं। वह परम पुरुष दीप्तिमान् होकर समस्त पदार्थों में तेजरूप में प्रकट होता है। दूसरी ऋचा 'उद्वयं तमसस्परि'......., जो यहाँ प्रस्तुत है, का अर्थ इस प्रकार है- ] 'तमिस्रा ( अज्ञानरूप) को दूर करने वाले परब्रह्म के प्रकाश को देखते हुए और आत्म ज्योति को देखते हुए हम देवों में देदीप्यमान सूर्य रूप सर्वोत्तम ज्योति को प्राप्त हुए ॥ ७ ॥ ॥ अष्टादशः खण्डः ॥ मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथाधिदैवतमाकाशो ब्रह्मेत्युभयमादिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च ॥ १ ॥ मन ब्रह्मस्वरूप है- इस प्रकार उपासना करे । यह आध्यात्मिक विवेचन है। आकाश ब्रह्मस्वरूप है- इस प्रकार उपासना करे-यह आधिदैविक विवेचन है। इस प्रकार यह आध्यात्मिक और आधिदैविक दोनों का विवेचन हुआ॥ १ ॥ तदेतच्चतुष्पादब्रह्म। वाक् पादः प्राणः पादश्चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद इत्यध्यात्म- मथाधिदैवतमग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पाद इत्युभयमेवादिष्टं भवत्यध्यात्मं चैवाधिदैवतं च ॥ २ ॥ वह (मनोमय ब्रह्म) चार पादों वाला है। वाणी, प्राण, चक्षु और श्रोत्र- ये चार पाद हैं। यह आध्यात्मिक विवेचन हुआ। इसी प्रकार आधिदैविक विवेचन में आकाशरूप ब्रह्म चार पादों का है। अग्नि, वायु, आदित्य और दिशाएँ- ये चार पाद हैं। इस प्रकार यह आध्यात्मिक और आधिदैविक दोनों का विवेचन हुआ॥ २ ॥ वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः। सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ३ ॥ वाणी ही मनोमय ब्रह्म का चतुर्थ पाद है। वह अग्निरूप ज्योति से दीप्तिमान् और तेजस्वी होती है। जो साधक इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेज के द्वारा देदीप्यमान और तेजस्वी होता है॥ ३ ॥ प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः। स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ४॥ प्राण ही मनोमय ब्रह्म का चतुर्थ पाद है। वह वायुरूप ज्योति से दीप्तिमान् और तेजस्वी होता है। जो साधक इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेज के द्वारा देदीप्यमान और तेजस्वी होता है॥ ४ ॥ चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स आदित्येन ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ५ ॥ चक्षु ही मनोमय ब्रह्म का चतुर्थ पाद है। वह आदित्यरूप ज्योति से दीप्तिमान् और तेजस्वी होता है। जो साधक इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मवर्चस से देदीप्यमान और तेजस्वी होता है॥ ५ ॥