भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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१२६ छान्दोग्योपनिषद् श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स दिग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद य एवं वेद ॥ ६ ॥ श्रोत्र ही मनोमय ब्रह्म का चतुर्थ पाद है। वह दिशाओं रूपी ज्योति से दीप्तिमान् और तेजस्वी होता है। जो साधक इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मवर्चस से देदीप्यमान और तेजस्वी होता है ॥ ६ ॥ ॥ एकोनविंशः खण्डः ॥ आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत्तत्सदासीत्तत्समभव- तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम् ॥ १ ॥ आदित्य ही ब्रह्म है, ऐसा विवेचन मिलता है। उसी की विविध व्याख्याएँ की जाती हैं। आदि में यह असत्रूप (अदृश्य) ही था, तदनन्तर वह सत्रूप (प्रत्यक्ष-प्रकट) हुआ। वह विकसित होकर अण्डे में परिवर्तित हुआ। कालान्तर में वह अण्ड विकसित होकर फूटा। उसके दो खण्ड हुए- एक रजत, दूसरा स्वर्ण ॥ १ ॥ तद्यद्रजतं सेयं पृथिवी यत्सुवर्णं सा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बं समेघो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकं स समुद्रः ॥ २ ॥ उनमें जो खण्ड रजत रूप प्रकट हुआ, वह यह पृथिवी है और जो स्वर्णरूप खण्ड प्रकट हुआ, वह द्युलोक है। उस अण्डे का जो जरायु भाग था, वे पर्वत हैं, जो उल्ब भाग था, वह मेघयुक्त कुहरा है, जो धमनियां थीं, वे नदियाँ हैं तथा जो मूत्राशय का जल था, वह समुद्र है ॥ २ ॥ अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानं घोषा उलूलवोऽनूदतिष्ठन्त् सर्वाणि च भूतानि च सर्वे च कामास्तस्मात्तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रति घोषा उलूलवोऽनूत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सर्वे चैव कामाः ॥ ३ ॥ उस अण्डे से जो उत्पन्न हुआ, वह आदित्य ही है। उससे विस्फोट जन्य तीव्र घोष उत्पन्न हुआ, उसी से सम्पूर्ण प्राणी और सम्पूर्ण भोग-साधन उत्पन्न हुए हैं। इसीलिए आदित्य के उदय और अस्त होने पर तीव्र घोष होता है और समस्त प्राणी एवं सम्पूर्ण भोग-साधन विकसित होते हैं ॥ ३ ॥ स य एतमेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेरन् ॥४॥ इस प्रकार जो 'आदित्य ही ब्रह्म है', यह जानकर उपासना करता है, इसके समीप सुखप्रद घोष सुनाई देते हैं और उसे सुख प्रदान करते हैं, सन्तोष प्रदान करते हैं ॥ ४ ॥