१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३० छान्दोग्योपनिषद् तब उन्होंने उसे भिक्षा दे दी। वह वाणी आदि पञ्च इन्द्रियों से भिन्न है तथा अग्नि, वायु आदि पञ्चभूतों से भी भिन्न सत्ता है। इस प्रकार ये सब संख्या में दस होते हैं। वह विराट् सत्ता ही अन्न का भक्षण करने वाली है। वही सम्पूर्ण जगत् रूप में दृष्ट है। जो ऐसा जानते हैं, उनके द्वारा यह सब दृष्ट होता है और वे अन्न का भक्षण करने वाले होते हैं ॥ ८ ॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरममन्त्रयांचक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किं गोत्रोन्वहमस्मीति ॥ १ ॥ सत्यकाम जाबाल ने अपनी माँ जबाला से कहा- हे मातः! मैं ब्रह्मचारी बनकर गुरुकुल में रहना चाहता हूँ, मुझे बताएँ कि मेरा गोत्र क्या है? ॥ १ ॥ सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति ॥ २ ॥ जबाला ने कहा- हे तात! तुम जिस गोत्र के हो, उसे मैं भी नहीं जानती। यौवनावस्था में मैं बहुत से अतिथियों की परिचर्या में संलग्न रहती थी। उन्हीं दिनों तुझे प्राप्त किया, तत्पश्चात् तुम्हारे पिता के न रहने पर(उनके दिवंगत हो जाने पर) मैं गोत्र न जान सकी। अतः मैं नहीं जानती कि तुम्हारा गोत्र क्या है? मैं जबाला नाम की हूँ और तुम सत्यकाम नाम के हो, अतः आचार्य से कहो- मैं सत्यकाम जाबाल हूँ ॥ २ ॥ स ह हारिद्रुमतं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्यं भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति ॥ ३ ॥ उन्होंने ऋषि हारिद्रुमत गौतम के पास जाकर कहा - हे भगवन् ! मैं आपके पास ब्रह्मचर्य पूर्वक निवास करना चाहता हूँ, इसलिए मैं आपके पास आया हूँ ॥ ३ ॥ तः होवाच किंगोत्रो नु सोम्यासीति स होवाच नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्म्यपृच्छं मातरः सा मा प्रत्यब्रवीद्बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति सोऽहं सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥ ४ ॥ गौतम ऋषि ने कहा- हे सोम्य! तुम किस गोत्र के हो ? उनने कहा- हे भगवन्! मैं किस गोत्र का हूँ, यह मैं नहीं जानता। मैंने अपनी माता से पूछा तो उन्होंने कहा कि मैं बहुत पहले से अतिथियों की सेवा करती रहती थी, जब तुझे प्राप्त किया, तब तुम्हारे पिता के (शीघ्र) न रहने से मैं गोत्र न जान सकी (पूछ सकी)। अतः मैं नहीं जानती कि तुम किस गोत्र के हो ? मेरा नाम जबाला है, तुम्हारा सत्यकाम। अतः मैं सत्यकाम जाबाल हूँ ॥ ४ ॥ तः होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधः सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशता गा निराकृत्योवाचेमाः सोम्यानुसंव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणावर्त्तयेति स ह वर्षगणं प्रोवास ता यदा सहस्रं संपेदुः ॥ ५ ॥ गौतम ऋषि ने कहा- ऐसी सत्य अभिव्यक्ति ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं कर सकता। हे सोम्य! चूँकि तुमने सत्य वचनों का त्याग नहीं किया, अतः तुम समिधा ले आओ, मैं तुम्हारा उपनयन