१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय-४ खण्ड ६ मन्त्र ३ १३१ करूँगा। तब उन्होंने सत्यकाम का उपनयन करके चार सौ कृश एवं अबला गौओं को देकर उनसे कहा- हे सोम्य ! तुम इन गौओं को ले जाकर चराना। इन्हें वन में तब तक चराना, जब तक ये सहस्र गौएँ न हो जाएँ। उन गौओं के अनुगामी होकर सत्यकाम ने कहा - हे आचार्य ! जब तक ये सहस्र गौएँ न हो जाएँगी तब तक नहीं लौटूँगा। सहस्र संख्यक गौएँ होने तक वे वर्षों वन में भ्रमण करते रहे ॥ ५ ॥ ॥ पञ्चमः खण्डः ॥ अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्राप्ताः सोम्य सहस्रं स्मः प्रापय न आचार्यकुलम् ॥ १ ॥ एक दिन वृषभ ने सत्यकाम से कहा- हे सत्यकाम ! अब हम एक हजार हो गये हैं, हमें आचार्य के पास ले चलो ॥ १ ॥ ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राची दिक्कला प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ॥ २ ॥ पुनः वृषभ ने सत्यकाम से कहा- हे सत्यकाम ! क्या मैं तुम्हें ब्रह्म का एक पाद बताऊँ ? सत्यकाम ने उनसे कहा- हे भगवन् ! मुझे अवश्य बताएँ। तब वृषभ ने कहा- पूर्व, पश्चिम,उत्तर और दक्षिण ये दिक् कलाएँ हैं। वह 'प्रकाशमान' संज्ञक ब्रह्म इन चारों कलाओं में एक पाद व्याप्त करता है ॥ २ ॥ स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते प्रकाशवानस्मिँल्लोके भवति प्रकाशवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते ॥ ३ ॥ इस प्रकार जानने वाला जो विद्वान् ब्रह्म के प्रकाशवान् स्वरूप की उपासना करता है, वह इस लोक में प्रकाशवान् होता है और प्रकाशवान् लोकों को विजित करता है। इस प्रकार वह विद्वान् जो चतुष्कल पाद की ब्रह्म के प्रकाशमान रूप की उपासना करता है, वह उसी स्वरूप को प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ ॥ षष्ठः खण्डः ॥ अग्निष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ॥ १ ॥ उस वृषभ ने उनसे पुनः कहा- ब्रह्म का दूसरा पाद तुम्हें अग्निदेव बताएँगे। सत्यकाम ने गौओं को आचार्य कुल की ओर हाँक दिया। सायंकाल जहाँ हुई, वहीं वे गौओं को रोककर अग्निदेव को प्रज्वलित कर समिधाधान करके अग्नि के पश्चिम में, पूर्व की ओर मुख करके बैठ गये ॥ १ ॥ तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥ अग्निदेव ने सत्यकाम को सम्बोधित किया। प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा- जी भगवन् ! ॥ २ ॥ ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच पृथिवी कलान्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥ ३ ॥ अग्निदेव ने उनसे कहा- हे सोम्य ! मैं आपको ब्रह्म का दूसरा पाद बताऊँ ? उन्होंने कहा- हे भगवन् ! मुझे अवश्य बताएँ। तब अग्निदेव ने कहा- एक कला पृथ्वी, दूसरी कला अन्तरिक्ष, तीसरी कला द्युलोक और चौथी कला समुद्र है। हे सोम्य! ब्रह्म का यह चतुष्कल पाद अनन्तवान् संज्ञक है ॥ ३ ॥