भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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१३२ छान्दोग्योपनिषद् स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्तेऽनन्तवानस्मिँल्लोके भवत्यनन्तवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ इस प्रकार जानने वाला जो विद्वान् ब्रह्म के अनन्तवान् संज्ञक चतुष्कल पाद की उपासना करता है, वह इस लोक में अनन्तवान् होता है और अनन्तवान् लोकों को विजित करता है। इस प्रकार ब्रह्म के अनन्तवान् संज्ञक चतुष्कल पाद की उपासना करने वाला विद्वान् ब्रह्म के उसी स्वरूप को प्राप्त होता है ॥४॥ ॥ सप्तमः खण्डः ॥ हँसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ्ङोपविवेश ॥ १ ॥ अग्निदेव ने उनसे कहा- आपको ब्रह्म का तीसरा पाद हंस बताएगा। दूसरे दिन उन्होंने गौओं को आचार्यकुल की ओर हाँक दिया। जहाँ सायंकाल हुई, वहाँ वे गौओं को रोककर अग्नि प्रज्वलित कर समिधाधान करके अग्नि के पश्चिमी ओर पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये ॥ १ ॥ तँ हंस उप निपत्याभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥ तब हंस ने अग्नि के समीप उतर कर सत्यकाम को पुकारा, उन्होंने प्रत्युत्तर दिया- जी भगवन् ! ॥ २ ॥ ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥ ३ ॥ हंस ने उनसे कहा- हे सोम्य ! मैं तुम्हें ब्रह्म का तीसरा पाद बताऊँ ? सत्यकाम ने कहा- हाँ भगवन् ! आप मुझे बताएँ। तब हंस ने उनसे कहा- अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा और विद्युत् - ये चार कलाएँ हैं। हे सोम्य ! ब्रह्म का यह चतुष्कल पाद ज्योतिष्मान् नाम का है ॥ ३ ॥ स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिँल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ इस प्रकार जानने वाला जो विद्वान् ब्रह्म के इस 'ज्योतिष्मान्' संज्ञक चतुष्कल पाद की उपासना करता है, वह इस लोक में ज्योतिष्मान् होता है और ज्योतिष्मान् लोकों को विजित करता है। इस प्रकार ब्रह्म के ज्योतिष्मान् स्वरूप की उपासना करने वाला विद्वान् ब्रह्म के उसी स्वरूप को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ ॥ अष्टमः खण्डः ॥ मद्गुष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ्ङोपविवेश ॥ १ ॥ हंस ने सत्यकाम से कहा- मद्गु (जलपक्षी) तुम्हें ब्रह्म का चौथा पाद बताएगा। अगले दिन उन्होंने गौओं को आचार्य कुल की ओर हाँक दिया। जहाँ सायंकाल हुई, वहाँ वे गौओं को रोककर अग्नि प्रज्वलित कर समिधाधान करके अग्नि के पश्चिमी ओर पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये ॥ १ ॥ तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥ मद्गु ने उनके पास आकर उन्हें पुकारा, तो सत्यकाम ने उत्तर दिया- जी भगवन् ! ॥ २ ॥