१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ खण्ड १० मन्त्र १ १३३ ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राणः कला चक्षुः कला श्रोत्रं कला मनः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम ॥ ३॥ तब मद्गु ने उनसे कहा- हे सोम्य ! मैं तुम्हें ब्रह्म का चौथा पाद बताऊँगा ? सत्यकाम ने कहा- हे भगवन् ! मुझे अवश्य बताएँ। प्राण, चक्षु, श्रोत्र और मन- ये चार कलाएँ हैं। हे सोम्य! यह ब्रह्म का चतुष्कल पाद आयतनवान् (आश्रययुक्त) संज्ञा का है॥ ३॥ स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्त आयतनवानस्मिँल्लोके भवत्यायतनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते ॥४॥ इस प्रकार जानने वाला जो विद्वान् ब्रह्म के इस 'आयतनवान्' संज्ञक चतुष्कल पाद की उपासना करता है, वह इस लोक में आयतनवान् होता है और आयतनवान् लोकों को विजित करता है। इस प्रकार ब्रह्म के आयतनवान् स्वरूप की उपासना करने वाला विद्वान् ब्रह्म के उसी स्वरूप को प्राप्त होता है॥ ४॥ ॥ नवमः खण्डः ॥ प्राप हाचार्यकुलं तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ १॥ जब सत्यकाम आचार्यकुल में पहुँचे, तो आचार्य ने उन्हें सम्बोधित किया- सत्यकाम ! उन्होंने उत्तर दिया जी भगवन् !॥ १॥ ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वानुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवाँस्त्वेव मे कामे ब्रूयात् ॥ २॥ आचार्य ने उनसे कहा हे सोम्य ! तुम ब्रह्मवेत्ता के सदृश दीप्तिमान् हो रहे हो, तुम्हें किसने उपदेश दिया ? सत्यकाम ने उन्हें उत्तर दिया- हे आचार्य ! मुझे मनुष्य से भिन्न प्राणियों ने उपदेश दिया है। अब मेरी कामना के अनुसार आप ही मुझे उपदेश करें ॥ २ ॥ श्रुतः ह्येव मे भगवद्दृशेभ्य आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापतीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किंचन वीयायेति वीयायेति ॥ ३॥ तब आचार्य ने उन्हें उपदेश किया- मैंने भगवद् स्वरूप ऋषियों के मुख से सुना है कि आचार्य के मुख से जानी गई विद्या ही उपयुक्तता-सार्थकता को प्राप्त होती है। आगे उन्होंने जब उपदेश किया, तो कुछ भी जानना शेष न रहा अर्थात् वे सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त हुए ॥ ३॥ ॥ दशमः खण्डः ॥ उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास तस्य ह द्वादशवर्षाण्यग्नीन्परिचचार स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयँस्तँ ह स्मैव न समावर्तयति ॥ १॥ उपकोसल कामलायन (कमल का वंशज) सत्यकाम जाबाल के आचार्यत्व में ब्रह्मचर्य पूर्वक वास करते थे। उन्होंने बारह वर्ष तक आचार्यकुल में अग्नियों की परिचर्या की । आचार्य सत्यकाम ने अन्य ब्रह्मचारियों का समावर्तन संस्कार कर दिया, परन्तु उनका नहीं किया ॥ १॥