१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३४ छान्दोग्योपनिषद् तं जायोवाच तप्तो ब्रह्मचारी कुशलमग्नीन्परिचचारीन्मा त्वाग्नयः परिप्रवोचन्प्रब्रूह्यस्मा इति तस्मै हाप्रोच्यैव प्रवासांचक्रे ॥ २ ॥ आचार्य सत्यकाम से उनकी धर्मपत्नी ने कहा- यह ब्रह्मचारी बहुत तपश्चर्या कर चुका है, इनके द्वारा भली प्रकार अग्नियों की परिचर्या भी की गई है। अतः आप इसे उपदेश कर दें, जिससे अग्नियां आपकी निन्दा न करें, किन्तु वे बिना कुछ कहे प्रवास पर चल दिये ॥ २ ॥ स ह व्याधिनानशितुं दधे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिन्नशान किंनु नाश्नासीति स होवाच बहव इमेऽस्मिन्पुरुषे कामा नानात्यया व्याधिभिः प्रतिपूर्णोऽस्मि नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥ उन उपकोसल ने मानसिक व्यथा से अनशन करने का निश्चय किया। उनसे आचार्य की धर्मपत्नी ने कहा- हे ब्रह्मचारिन् ! तू भोजन क्यों नहीं करता ? उन्होंने कहा- इस पुरुष में बहुत सी कामनाएँ रहती हैं, जो दुःख देती हैं। मैं उन्हीं विविध मानसिक व्यथाओं से परिपूर्ण हूँ, अतः भोजन नहीं करूँगा ॥ ३ ॥ अथ हाग्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं नः पर्यचारीद्धन्तास्मै प्रब्रवामेति तस्मै होचुः ॥ तदनन्तर अग्नियों ने एकत्रित होकर आपस में कहा- यह ब्रह्मचारी तपश्चर्या कर चुका है। इसने हमारी भली प्रकार परिचर्या की है। अब हम इसे उपदेश करते हैं। ऐसा उन अग्नियों ने निश्चय कर उनसे कहा- प्राण ब्रह्म है। 'क' (सुख) ब्रह्म है और 'ख' (आकाश) ब्रह्म है ॥ ४ ॥ प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामीति ते होचुर्यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः ॥ ५ ॥ उपकोसल ने कहा- यह मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है, किन्तु 'क' और 'ख' मैं नहीं जानता। उन अग्नियों ने उत्तर दिया- जो 'क' है वही 'ख' है और जो 'ख' है वही 'क' है। इस प्रकार उन्होंने उपकोसल को प्राण और उसके आधारभूत आकाश का उपदेश किया ॥ ५ ॥ ॥ एकादशः खण्डः ॥ अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इति य एष आदित्ये पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥ आगे उन्हें गार्हपत्याग्नि ने उपदेश किया- पृथिवी, अग्नि, अन्न और आदित्य, इन चारों में मैं ही हूँ। आदित्य के मध्य जो पुरुष दिखाई देता है, वह मैं ही हूँ, वही मेरा (विस्तृत) रूप है ॥ १ ॥ स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकीभवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिँश्च लोकेऽमुष्मिँश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥ जो पुरुष इस प्रकार जानकर उसकी (आदित्य पुरुष की) उपासना करता है, वह पाप कर्मों को नष्ट कर देता है। वह अग्नि के भोगों (लोक) को प्राप्त होता है, पूर्ण आयु का उपभोग करता है, तेजस्वी जीवन जीता है, उनके वंशज क्षीण नहीं होते। इस प्रकार जानकर जो पुरुष उसकी उपासना करता है, उसका हम (अग्नियाँ) इस लोक तथा परलोक (अदृश्य लोक) में भी पालन करती हैं ॥ २ ॥