भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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अध्याय ४ खण्ड १४ मन्त्र २ १३५ ॥ द्वादशः खण्डः ॥ अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशासापो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥ तदनन्तर अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) ने उन्हें उपदेश किया-जल, दिशा, नक्षत्र और चन्द्रमा- ये चार रूप मेरे ही हैं। चन्द्रमा के मध्य जो पुरुष दिखाई देता है, वह मैं ही हूँ, वही मेरा रूप है ॥ १ ॥ स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकीभवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ वह साधक जो इस प्रकार जानकर उसकी (चन्द्र पुरुष) की उपासना करता है, वह पाप कर्मों को विनष्ट करता है, चन्द्रलोक को प्राप्त होता है, पूर्ण आयु का उपभोग करता है और तेजस्वी जीवन जीता है। उसके अनुवर्ती वंशज कभी क्षीण नहीं होते। जो इस प्रकार जानकर उसकी उपासना करता है, इस लोक तथा परलोक में भी हम (अग्नियाँ) उसका पालन करती हैं ॥ २ ॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति य एष विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥ उसके बाद आहवनीय अग्नि ने उन्हें उपदेश किया-प्राण, आकाश, द्युलोक और विद्युत् - इन चारों में मैं ही हूँ। यह जो विद्युत् के मध्य पुरुष दिखायी देता है, वह मैं ही हूँ। वही मेरा रूप है ॥ १ ॥ स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥ वह साधक जो इस प्रकार जानकर उसकी (विद्युत् पुरुष की ) उपासना करता है, वह पापकर्मों को विनष्ट करता है, विद्युत् लोक में भोगों से युक्त होता है, पूर्ण आयु का उपभोग करता है और तेजस्वी जीवन जीता है। उसके अनुवर्ती वंशज कभी क्षीण नहीं होते। जो इस प्रकार जानकर उसकी उपासना करता है, हम (अग्नियाँ) उसका इस लोक में और परलोक में भी पालन करती हैं ॥ २ ॥ ॥ चतुर्दशः खण्डः ॥ ते होचुरुपकोसलैषा सोम्य तेऽस्मद्विद्यात्मविद्या चाचार्यस्तु ते गतिं वक्तेत्याजगाम हास्याचार्यस्तमाचार्योऽभ्युवादोपकोसल ३ इति ॥ १ ॥ उन अग्नियों ने उपकोसल से कहा- हे उपकोसल ! हे सोम्य ! तुम्हारे लिए हमने यह विद्या (अग्नि) और आत्म विद्या कही। इससे आगे की विद्या तुझे आचार्य बताएँगे। इसके बाद आचार्य आये और उपकोसल को सम्बोधित किया- उपकोसल ! ॥ १ ॥ भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वानुशशासेति को नु मानुशिष्याद्भो इतीहापेव निहुत इमे नूनमीदृशा अन्यादृशा इतीहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किल तेऽवोचन्निति ॥ २ ॥