भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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पृष्ठ 136

१३६ छान्दोग्योपनिषद उन्होंने प्रत्युत्तर दिया- जी भगवन्! आचार्य सत्यकाम ने उनसे कहा- हे सोम्य! तुम्हारा मुख ब्रह्मवेत्ता के सदृश दिखाई पड़ता है। उपकोसल ने उनसे कहा- भगवन्! मुझे उपदेश देने वाला यहाँ कौन है? तब अग्नियों की ओर संकेत कर कहा- उन्होंने ही मुझे उपदेश दिया है, परन्तु अब ये अन्य स्वरूप में हैं। आचार्य ने उनसे कहा- हे सोम्य! इन्होंने क्या उपदेश किया है? ॥ २ ॥ इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान्वाव किल सोम्य तेऽवोचन्न्रहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश ? आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच ॥ ३ ॥ उपकोसल ने अग्नियों का उपदेश आचार्य को बताया। तब आचार्य ने उनसे कहा- हे सोम्य! इन्होंने तो तुझे केवल लोकों का ज्ञान दिया है। अब तुझे मैं वह ज्ञान देता हूँ, जिसे जानने पर पाप कर्म उसी प्रकार लिप्त नहीं होते, जिस प्रकार कमल पत्र जल से लिप्त नहीं होते। उन्होंने कहा- भगवन्! मुझे अवश्य बताएं। तब आचार्य ने उन्हें उपदेश दिया ॥ ३ ॥ ॥ पञ्चदशः खण्डः ॥ य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तद्यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चन्ति वर्त्मनी एव गच्छति ॥ १ ॥ यह नेत्र में जो पुरुष दिखायी देता है, (जो चक्षुओं का चक्षु अथवा दृष्टि का द्रष्टा है) वह आत्मा है। यह अविनाशी, भयरहित और ब्रह्मस्वरूप है। उसके स्थान पर जल या घृत डालें, तो वह पलकों में ही चला जाता है (अर्थात् वह सम्पूर्ण पदार्थों से अलिप्त रहता है।) ॥ १ ॥ एतः संयद्वाम इत्याचक्षत एतः हि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति सर्वाण्येनं वामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद ॥ २ ॥ इस पुरुष को 'संयद्वाम' कहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण शोभन वस्तुएँ सब ओर से इसे ही प्राप्त होती हैं। जो साधक इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, वह सर्वोपयोगी वस्तुएँ सब ओर से धारण करता है॥ एष उ एव वामनीरेष हि सर्वाणि वामानि नयति सर्वाणि वामानि नयति य एवं वेद ॥ ३ ॥ यह पुरुष निश्चय ही सम्पूर्ण पुण्यफलों को धारण करने वाला है। जो साधक इस प्रकार जानता है, वह सम्पूर्ण पुण्यफलों को धारण करता है॥ ३ ॥ एष उ एव भामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद ॥ ४ ॥ यह पुरुष निश्चय ही प्रकाशमान है, क्योंकि यही सम्पूर्ण लोकों में प्रकाशित होता है। जो साधक इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह सम्पूर्ण लोकों में प्रकाशित होता है॥ ४॥ अथ यदु चैवास्मिञ्छव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेवाभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमपूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासांस्तान्मासेभ्यः संवत्सरः संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः ॥ ५ ॥ स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते नावर्तन्ते ॥ ६ ॥