१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ खण्ड १६ मन्त्र ५ १३७ इस प्रकार जानने वाला पुरुष मृत्यु के पूर्व या उपरान्त अर्चि देवता को प्राप्त होता है। फिर अर्चि देव से दिवस सम्बन्धी देव को, दिवस से शुक्ल पक्ष को, शुक्ल पक्ष से उत्तरायण के छः मासों को, उत्तरायण के छः मासों से संवत्सर को, संवत्सर से आदित्य को, आदित्य से चन्द्रमा को और चन्द्रमा से विद्युत् को प्राप्त होता हैं। वहाँ से अमानवी पुरुष (विशिष्ट देवपुरुष) उन्हें ब्रह्म लोक को प्राप्त कराता है। यह देवमार्ग अथवा ब्रह्म मार्ग है, इससे गमन करने वाला पुरुष पुनः इस मानव जगत् को नहीं प्राप्त होता ॥ ५-६ ॥ ॥ षोडशः खण्डः ॥ एष ह वै यज्ञो योऽयं पवत एष ह यन्निदꣳ सर्वं पुनाति। यदेष यन्निदꣳ सर्वं पुनाति तस्मादेष एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक् च वर्तनी ॥ १ ॥ वह जो प्रवहमान (वायु) है, वह यज्ञ ही है। यह प्रवहमान तत्त्व इस सम्पूर्ण जगत् को पवित्र करता है। चूँकि यह सम्पूर्ण जगत् को पवित्र करता है, अतः यही यज्ञ है। वाणी और मन ये दो इसके मार्ग हैं ॥ तयोरन्यतरां मनसा सꣳस्करोति ब्रह्मा वाचा होताध्वर्यु रुद्गातान्यतराꣳ स यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदति ॥ २ ॥ उनमें से एक मार्ग का संस्कार ब्रह्मा अपने मन से करते हैं तथा होता, अध्वर्यु और उद्गाता वाणी द्वारा दूसरे मार्ग का संस्कार करते हैं। (यदि) प्रातः कालीन अनुवाक के आरम्भ होने के पूर्व ब्रह्मा अपनी वाणी का प्रयोग करते हैं ॥ २ ॥ अन्यतरामेव वर्तनीꣳ सꣳस्करोति हीयतेऽन्यतरा स यथैकपाद्ब्रजन्नथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यत्येवमस्य यज्ञो रिष्यति यज्ञꣳ रिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति स इष्ट्वा पापीयान्भवति ॥ ३ ॥ (तो) वह केवल एक वाणी के मार्ग का ही संस्कार करते हैं, दूसरा मार्ग नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार एक पैर से चलने वाला पुरुष अथवा एक पहिये से चलने वाला रथ नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार इस यज्ञ का विनाश हो जाता है। यज्ञ के विनष्ट होने पर यजमान भी नष्ट हो जाता है। ऐसा यज्ञ करने पर यजमान अधिक पापों को प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदत्युभे एव वर्तनी सꣳस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा ॥ ४ ॥ यदि प्रातः कालीन अनुवाक आरम्भ करने के पश्चात् परिधानीया ऋचा से पूर्व ब्रह्मा नहीं बोलते हैं, तो (समस्त ऋत्विक् मिलकर) दोनों ही मार्गों का संस्कार करते हैं, तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं होता ॥ ४ ॥ स यथोभयपाद्ब्रजन्नथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान्भवति ॥ ५ ॥ जिस प्रकार दोनों पैरों से चलने वाला पुरुष तथा दोनों पहियों से चलने वाला रथ भली प्रकार स्थित रहता है, वैसे ही यह यज्ञ भी भली प्रकार स्थित रहता है। यज्ञ के स्थित रहने से यजमान भी भली प्रकार स्थित रहता है। ऐसा यज्ञ करके यजमान विशिष्ट श्रेय को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥