१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४० छान्दोग्योपनिषद् ॥ अथ पञ्चमोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ इस अध्याय में प्राण की सर्वश्रेष्ठता एवं पञ्चाग्नि विद्या का वर्णन किया गया है- यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥ जो ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ (आयु में प्रथम और गुणों में अधिक) को जानता है, वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है। निश्चय ही प्राण ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ है ॥ १ ॥ यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥ जो वसिष्ठ (समग्र श्रेष्ठता) को जानता है, वह स्वजातियों में वसिष्ठ (श्रेष्ठ धन से सम्पन्न) होता है। निश्चय ही वाक् (वाणी) वसिष्ठ है ॥ २ ॥ यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिँश्च लोकेऽमुष्मिँश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥ जो कोई प्रतिष्ठा को जानता है, वह लोक, परलोक (स्थूल शरीर एवं सूक्ष्म शरीर) में प्रतिष्ठित होता है। निश्चय ही चक्षु प्रतिष्ठा है ॥ ३ ॥ यो ह वै संपदं वेद सँहास्मै कामाः पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव संपत् ॥ ४ ॥ जो कोई सम्पद् को जानता है, उसे दैव और मानुष दोनों ही काम (भोग) सभी प्रकार से प्राप्त होते हैं। श्रोत्र ही सम्पत्ति है ॥ ४ ॥ यो ह वा आयतनं वेदायतनँ ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥ जो कोई आयतन को जानता है, वह स्वजनों का आयतन होता है अर्थात् उनका आश्रय बन जाता है। निश्चय ही मन आयतन है ॥ ५ ॥ अथ ह प्राणा अहँ श्रेयसि व्यूदिरेऽहँ श्रेयानस्म्यहँ श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥ एक बार प्राण (विभिन्न इन्द्रियों में स्थित प्राण) अपनी श्रेष्ठता के लिए परस्पर विवाद करने लगे कि मैं श्रेष्ठ हूँ - मैं श्रेष्ठ हूँ ॥ ६ ॥ ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन्को नः श्रेष्ठ इति तान्होवाच यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥ तब उन प्राणों ने अपने पिता प्रजापति के पास जाकर पूछा 'भगवन् ! हममें से श्रेष्ठ कौन है?' तब प्रजापति ने उत्तर दिया कि 'तुममें से जिस तत्त्व के निकल जाने पर शरीर अत्यन्त पापिष्ठ (जीवित रहते हुए भी प्राणहीन एवं उससे भी निकृष्ट जैसा) दिखाई देने लगे, वही तत्त्व श्रेष्ठ है' ॥ ७ ॥ सा ह वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा कला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवंमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥ (तब) वाक् इन्द्रिय ने उत्क्रमण किया, अर्थात् शरीर से बाहर चली गयी। उसने एक वर्ष तक प्रवास में रहने के बाद वापस लौटकर पूछा- 'मेरे बिना तुम जीवित रहने में कैसे समर्थ रह सके?' तब इन्द्रियों ने कहा- जिस प्रकार गूँगा वाणी से बिना बोले हुए भी प्राण से श्वासोच्छ्वास करता है, नेत्रों से देखता है,