१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ खण्ड १ मन्त्र १३ १४१ कानों से सुनता है और मन से चिन्तन करते हुए जीवनयापन करता है। उसी प्रकार (हम भी जीवित रहे) ऐसा सुनकर वागिन्द्रिय ने शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥ ८ ॥ चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथान्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैबमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥ (फिर) चक्षु (नेत्र) ने उत्क्रमण किया। एक वर्ष तक प्रवास में रहने के पश्चात् वापस लौटकर पूछा- ‘मेरे बिना तुम जीवित कैसे रह सके?, (तब अन्य इन्द्रियों ने कहा) ‘जिस प्रकार नेत्रहीन नेत्रों से देख नहीं सकता, तो भी प्राणों से श्वासोच्छ्वास करते, वाणी से बोलते, कानों से श्रवण करते और मन से चिन्तन करते हुए जीवित रहता है, उसी प्रकार [हम भी जीवित रहे], ऐसा सुनकर नेत्र ने पुनः प्रवेश किया ॥ ९ ॥ श्रोत्रः होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिरा अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥ (इसके पश्चात्) श्रोत्र (कान) ने उत्क्रमण किया। एक वर्ष तक प्रवास में रहने के उपरान्त पुनः लौटकर पूछा- हमारे बिना तुम कैसे जीवित रहे ? तब अन्य इन्द्रियों ने कहा- ‘जिस प्रकार बधिर बिना सुने, प्राण से प्राणन करते, वाणी से बोलते, चक्षु से देखते और मन से चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं, वैसे ही हम भी जीवित रहे।’ यह सुन करके श्रोत्र ने शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥ १० ॥ मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥ (श्रोत्र के बाद) मन ने बाह्य गमन किया। एक वर्ष तक प्रवास में रहने के बाद लौटकर उसने वाक् आदि इन्द्रियों से पूछा कि ‘मेरे बिना तुम किस प्रकार जीवित रहे ?’ (तब उन सभी ने कहा) ‘जिस प्रकार छोटे बच्चे, जिनका कि मन विकसित नहीं होता, प्राण द्वारा श्वासोच्छ्वास करते, वाणी से बोलते, चक्षु से देखते, कर्णों से श्रवण करते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार (हम भी जीवित रहे)।’ यह सुनकर मन ने शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥ ११ ॥ अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन्स यथासुहयः पड्वीशशङ्कन्संखिदेदेवमित- रान्प्राणान्समखिदत्तः हाभिसमेत्योचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥ फिर प्राण बहिर्गमन करने के लिए तत्पर होता है। जिस तरह शक्तिशाली अश्व पैर बाँधने की कीलों को उखाड़ देता है, उसी प्रकार प्राण ने समस्त इन्द्रियों के बन्धन से अपने आप को मुक्त किया। तब उन सबने प्राण से निवेदन किया कि ‘भगवन्! आप अपने ही स्थान पर रहें, आप ही हम सब में श्रेष्ठ हैं, आप बाहर न जाएँ' ॥ १२ ॥ अथ हैन वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैन चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति ॥ १३ ॥ तत्पश्चात् उस वागिन्द्रिय ने मुख्य प्राण से कहा- ‘मैं जो वसिष्ठ हूँ, वह वसिष्ठ आप ही हैं।’ चक्षु ने कहा- ‘‘मैं जो प्रतिष्ठा हूँ, सो (वह) प्रतिष्ठा आप ही हैं।‘’ ॥ १३ ॥