भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 505 में से

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१४४ छाान्दोग्योपनिषद् ॥ तृतीयः खण्डः ॥ श्वेतकेतुर्हारुणेयः पञ्चालानाꣳसमितिमेयाय तꣳह प्रवाहणो जैवलिरुवाच कुमारानु त्वाशिषत्पितेत्यनु हि भगव इति ॥ १ ॥ पाञ्चाल नरेश की सभा में (एक बार) आरुणि पुत्र श्वेतकेतु आया। वहाँ उससे जीवल पुत्र प्रवाहण ने प्रश्न करते हुए कहा कि 'कुमार ! क्या तुम्हारे पिताजी ने तुमको शिक्षा प्रदान की है'। तब उसने कहा- हाँ, भगवन् ! हमने अपने पिताजी से शिक्षा प्राप्त की है ॥ १ ॥ वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति न भगव इति वेत्थ यथा पुनरावर्तन्त ३ इति न भगव इति वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति न भगव इति ॥ २ ॥ प्रवाहण ने पुनः प्रश्न किया कि क्या तुम्हें यह ज्ञात है कि प्रजा इस लोक से जाने के बाद कहाँ जाती है ? श्वेतकेतु ने कहा- ' भगवन् ! यह जानकारी मुझे नहीं है। उसने फिर पूछा कि क्या तुम्हें यह ज्ञात है कि वह प्रजा पुनः इस लोक में किस प्रकार आती है ? श्वेतकेतु ने पुनः नकारात्मक उत्तर दिया कि मुझे यह भी नहीं मालूम है। प्रवाहण पुनः अगला प्रश्न पूछता है कि देवयान और पितृयान मार्गों का एक दूसरे से अलग होने का स्थान क्या तुम्हें ज्ञात है ?' श्वेतकेतु ने कहा- नहीं भगवन् ! मैं यह भी नहीं जानता ॥ २ ॥ वेत्थ यथासौ लोको न संपूर्यत ३ इति न भगव इति वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति नैव भगव इति ॥ ३ ॥ प्रवाहण ने पुनः प्रश्न किया कि क्या तुम्हें ज्ञात है कि यह पितर लोक क्यों नहीं भरता है ? श्वेतकेतु ने कहा- 'नहीं भगवन् ! उसने फिर पूछा कि 'पाँचवीं आहुति के यजन कर दिये जाने पर घृत सहित सोमादि रस 'पुरुष' संज्ञा को कैसे प्राप्त करते हैं' ? श्वेतकेतु ने कहा- नहीं भगवन् ! मैं यह भी नहीं जानता ॥ ३ ॥ अथानु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात्कथꣳ सोऽनुशिष्टो ब्रुवीतेति स हायस्तः पितुरर्धमेयाय तꣳहोवाचाऽननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाशिषमिति ॥ ४ ॥ ''तो फिर तुमने स्वयं के सम्बन्ध में ऐसा क्यों कहा कि मुझे शिक्षा प्रदान की गयी है ?'' जो इन सभी विद्याओं की जानकारी नहीं रखता है, वह अपने को पूर्ण शिक्षित कैसे कह सकता है ? उपर्युक्त सभी प्रश्नों के उत्तर न दे पाने से त्रस्त होकर वह अपने पिता आरुणि के पास गया और बोला कि आपने मुझे शिक्षा दिये बगैर ही आश्वस्त कर दिया था कि मैंने तुझे शिक्षा प्रदान कर दी है ॥ ४ ॥ पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत्तेषां नैकञ्चनाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं तदैतानवदो यथाहमेषां नैकंचन वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५ ॥ श्वेतकेतु ने अपने पिता से कहा कि 'उस क्षत्रिय कुमार ने मुझसे अग्निविद्या से सम्बन्धित पाँच प्रश्न किये। मैं उनमें से एक का भी सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे सका। तब उसके पिता ने कहा कि 'तुमने ये जितने प्रश्न मुझसे कहे, मैं भी उनमें से एक प्रश्न का उत्तर नहीं जानता। यदि मुझे जानकारी होती, तो भला तुम्हें क्यों नहीं इसकी जानकारी देता ॥ ५ ॥

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