भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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अध्याय ५ खण्ड ४ मन्त्र २ १४५ स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हाञ्चकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तꣳहोवाच मानुषस्य भगवन्गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति स होवाच तवैव राजन्मानुषं वित्तं यामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तामेव मे ब्रूहीति स ह कृच्छ्रीबभूव ॥ ६ ॥ तब वह पिता और पुत्र (आरुणि और श्वेतकेतु) पुनः उस पाञ्चाल नरेश के समीप प्रश्नों की जिज्ञासा को लिए हुए आये। राजा ने अपने यहाँ आये उन दोनों (पिता और पुत्र) को सम्मानित किया। दूसरे दिन प्रातःकाल गौतम गोत्रोत्पन्न वे दोनों राजा की सभा में गये। उस राजा ने कहा कि 'हे भगवन् गौतम! आप सांसारिक धन का वरदान हमसे प्राप्त कर लें। तब उन मुनि ने कहा- राजन्! ये मनुष्य सम्बन्धी धन आपके ही पास रहें; आपने मेरे पुत्र के प्रति जो बात (प्रश्नरूप से) कही थी, वही मुझे बताने की कृपा करें। यह सुनकर वह राजा अत्यन्त संकट में पड़ गया॥ ६॥ तꣳह चिरं वसेत्याज्ञापयांचकार तꣳ होवाच यथा मा त्वं गौतमवदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान्गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ॥ ७ ॥ पाञ्चाल नरेश ने उन दोनों (पिता और पुत्र) को अपने पास चिरकाल तक रहने की आज्ञा प्रदान की। उसने कहा- 'हे गौतम! जिस प्रकार आपने मुझसे कहा है, उसे आप यह समझें कि प्राचीन काल में यह अग्निविद्या ब्राह्मण के पास नहीं गयी। इसी कारण से सभी लोकों में इस विद्या पर क्षत्रियों का ही अनुशासन रहा है। इस प्रकार कहकर उस राजा ने गौतम को अग्निविद्या का उपदेश दिया॥ ७॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ श्वेतकेतु से प्रवाहण ने जो प्रश्न पूछे थे, उनमें से पहले 'पाँचवीं आहुति में आपः पुरुष वाचक कैसे बन जाता है' इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है। इस प्रश्न के समाधान के साथ ही अन्य प्रश्नों के समाधान का मार्ग भी खुलता है। वेद ने इस सृष्टि को यज्ञमय कहा है। ऋषि स्थूल यज्ञ की उपमा देते हुए सृष्टिचक्र के विभिन्न चरणों को समझाते हैं। द्युलोक में पहली आहुति से सोम, अंतरिक्ष में दूसरी आहुति से वर्षा, पृथ्वी पर तीसरी आहुति से अन्न, पुरुष में चौथी आहुति से वीर्य तथा नारी में पाँचवीं आहुति से पुरुषवाची जीव की उत्पत्ति होती है। प्रश्न था 'आपः' पुरुष वाची कैसे बन जाता है। प्रथम आहुति श्रद्धा की कही गयी है। 'श्रद्धा = आपः' अर्थात् श्रद्धा और आपः पर्यायवाची शब्द हैं। वेद ने आपः को ब्रह्म के तप से उत्पन्न सृष्टि का मूल क्रियाशील पदार्थ माना है। प्रकारान्तर से यह चक्र 'ब्राह्मी चेतना' के 'जीव चेतना' के रूप में प्रकट होने तक के रहस्यात्मक चरणों को प्रकट करता है- असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ हे महर्षि गौतम! यह प्रसिद्ध द्युलोक ही अग्नि है। आदित्य ही उस अग्नि की समिद् (ईंधन) है, किरणें ही धूम हैं, दिन ही ज्वाला है, चन्द्रमा ही अङ्गार और नक्षत्र ही विस्फुलिङ्ग (चिनगारियाँ) हैं॥ १॥ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा संभवति ॥ २ ॥ उस द्युलोक रूप अग्नि में देवगण श्रद्धा का यजन करते हैं। उस आहुति से राजा सोम का प्रादुर्भाव होता है॥ २॥ [ सृष्टि यज्ञ के प्रथम चरण में श्रद्धा अथवा आपः तत्त्व के यजन से सोम अर्थात् आधारभूत पोषक प्रवाह की उत्पत्ति होती है।]