भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

१७६ छान्दोग्योपनिषद् हे नारद ! जल की अपेक्षा तेज अधिक श्रेष्ठ है। जिस समय यह वायु तत्त्व को निश्चल करके आकाश को चारों ओर से तप्त करता है, तब सभी कहते हैं कि गर्मी बहुत अधिक हो रही है, ताप बहुत बढ़ रहा है, अब वर्षा होगी। वह तेज ही सर्वप्रथम प्रकट होता है, तत्पश्चात् जल की रचना करता है। तेज ऊर्ध्व एवं तिर्यक् दिशा की ओर गमन करते हुए विद्युत् के साथ गर्जना करता है। इस तेज से ही विद्युत् प्रकट होती है, गर्जना होती है तथा प्रायः लोग कहते हैं कि वृष्टि होगी। चूँकि तेज सर्वप्रथम स्वयं प्रकट होकर जल की रचना करता है, इस कारण हे नारद ! तुम तेज की ही उपासना करो ॥ १ ॥ स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वै स तेजस्वतो लोकान्भास्वतोऽपहततमस्कान- भिसिद्ध्यति यावत्तेजसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवस्तेजसो भूय इति तेजसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥ (हे नारद !) जो (व्यक्ति) तेज को ब्रह्म के रूप में समझकर उसकी उपासना करता है। वह तेजवान्, प्रकाश और अन्धकार से रहित लोकों को प्राप्त करता है। जहाँ तक तेज की गति है, वहाँ तक उसकी स्वेच्छानुसार गति होती है। नारद जी ने पूछा- भगवन् ! तेज की अपेक्षा कुछ अन्य श्रेष्ठ है क्या ? सनत्कुमार ने कहा- हाँ है, इससे भी श्रेष्ठ है। तब हे भगवन् ! कृपा करके मुझे उसी श्रेष्ठ तत्त्व का उपदेश करें ॥ २ ॥ ॥ द्वादशः खण्डः ॥ आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्नि- राकाशेनाह्वयत्याकाशेन शृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ (हे नारद !) तेज से भी अधिक उत्कृष्ट आकाश है। आकाश में ही सूर्य, चन्द्रमा, विद्युत्, नक्षत्र एवं अग्नि स्थित हैं। आकाश द्वारा ही हम आपस में एक दूसरे को बुलाते हैं, आकाश द्वारा ही श्रवण करते हैं। आकाश के माध्यम से ही प्रतिश्रवण करते हैं। आकाश में ही सभी क्रीड़ा करते और नहीं भी करते हैं। (सभी पदार्थों) की उत्पत्ति आकाश में ही होती है तथा आकाश में ही (जीव एवं अङ्कुर) अभिवर्द्धित होते हैं। अतः हे नारद ! तुम आकाश तत्त्व की ही उपासना करो ॥ १ ॥ स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्त आकाशवतो वै स लोकान्प्रकाशवतोऽसं- बाधानुरुगायवतोऽभिसिद्ध्यति यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आकाशाद्भूय इत्याकाशाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥ (हे नारद!) जो व्यक्ति आकाश को 'यही ब्रह्म है' ऐसा मानकर उसकी उपासना करता है। वह प्रकाशवान्, आकाशवान्, कष्टरहित तथा अति विस्तृत लोकों को प्राप्त करता है। जिस क्षेत्र तक आकाश की सीमा है, वहाँ तक उसकी स्वेच्छा से गति (पहुँच) हो जाती है। (ऐसा सुनकर नारद जी ने प्रश्न किया-) हे भगवन् ! क्या आकाश से भी श्रेष्ठ है? सनत्कुमार ने कहा- हाँ है, आकाश से भी श्रेष्ठ है। (नारद जी ने कहा-) तो भगवन् ! कृपा करके मुझे आप उसी तत्त्व का उपदेश करें ॥ २ ॥