१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७ खण्ड १४ मन्त्र २ १७७ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ स्मरो वावाकाशाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि बहव आसीरन्न स्मरन्तो नैव ते कंचन शृणुयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन् यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन् स्मरेण वै पुत्रान्विजानाति स्मरेण पशून् स्मरमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ हे नारद ! स्मरण आकाश से अधिक श्रेष्ठ है। इसी से जहाँ बहुत से व्यक्ति (किसी स्थान विशेष पर) बैठे हुए हों; किन्तु फिर भी स्मरण न करने पर वे सभी न कुछ सुन सकने में, न मनन कर सकने में और न ही कुछ विशेष जान सकने में समर्थ हो सकते हैं, जब वे सभी स्मरण करते हैं, तभी वे सुन सकने में समर्थ हो सकते हैं, तभी मनन और विशेष जानकारी प्राप्त करने में समर्थ हो सकते हैं। स्मरण मात्र से ही मनुष्य अपने बच्चों और पशुओं को पहचानता है। (इसलिए हे नारद!) तुम स्मरण की उपासना करो ॥१ ॥ स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत्स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः स्मराद्भूय इति स्मराद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ (हे नारद!) जो (व्यक्ति) स्मरण (स्मर) की 'यही ब्रह्म है' अर्थात् ब्रह्म रूप में उपासना सम्पन्न करता है। जहाँ तक (स्मर) स्मरण का विषय (सीमा) है, वहाँ तक उस (व्यक्ति) की गति (पहुँच) हो जाती है। (इस प्रकार सुनने के पश्चात् नारद जी ने प्रश्न किया-) हे भगवन् ! क्या स्मरण से भी श्रेष्ठ कुछ है ? (तब सनत्कुमार जी ने कहा-) हाँ है, इससे भी श्रेष्ठ है। नारद बोले- हे भगवन् ! कृपा करके उसी श्रेष्ठ तत्त्व का उपदेश करने की कृपा करें ॥ २ ॥ ॥ चतुर्दशः खण्डः ॥ आशा वाव स्मराद्भूयस्याशद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते कर्माणि कुरुते पुत्राँश्च पशूँश्चेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति ॥ १ ॥ हे नारद ! स्मरण की अपेक्षा आशा कहीं अधिक श्रेष्ठ है। आशा द्वारा ही वृद्धि को प्राप्त हुआ स्मृतिभूत वह (व्यक्ति) स्मरण करता हुआ ही मन्त्रों के पाठ में संलग्न होता है। अपने कर्मों में रत हुआ पुत्र एवं पशुओं की तथा लोक एवं परलोक की भी इच्छा करता रहता है। (अतः हे नारद!) तुम इस श्रेष्ठतर वस्तु आशा की उपासना करो ॥ १ ॥ स य आशां ब्रह्मेत्युपास्त आशायास्य सर्वे कामाः समृद्ध्यन्त्यमोघा हास्याशिषो भवन्ति यावदाशाया गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आशां ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आशाया भूय इत्याशाया वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ (हे नारद!) जो व्यक्ति आशा को ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता है, उसके सभी उद्देश्य आशा के माध्यम से पूर्ण होते हैं। प्रायः उसकी प्रार्थना सफल होती है। जहाँ तक आशा की गति (सीमा) है, वहाँ तक उस व्यक्ति की इच्छानुकूल पहुँच हो जाती है। (नारद जी ने पूछा-) हे भगवन् ! आशा से भी क्या अधिक श्रेष्ठ कुछ होता है ? (सनत्कुमार ने कहा-) हाँ है, आशा से भी अधिक श्रेष्ठ है। तब भगवन् ! मुझे उसी श्रेष्ठ तत्त्व का उपदेश करें ॥ २ ॥