भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

१७८ छान्दोग्योपनिषद् ॥ पञ्चदशः खण्डः ॥ प्राणो वा आशाया भूयान्यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्वं: समर्पितं प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति। प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥ १ ॥ (हे नारद !) प्राण आशा से अधिक श्रेष्ठ है। जिस तरह रथ के पहिये के केन्द्र में ‘अरे’ प्रतिष्ठित रहते हैं, ठीक उसी तरह प्राण तत्त्व में सम्पूर्ण विश्व समाहित है। प्राण अपनी ही शक्ति द्वारा प्रस्थान करता है, समाहित प्राण ही प्राण को प्रदान करता है तथा प्राण के लिए ही प्रदान करता है। प्राण ही पिता, प्राण ही माता, प्राण ही भाई, प्राण ही बहिन, प्राण ही आचार्य तथा प्राण ही श्रेष्ठ ब्राह्मण है ॥ १ ॥ स यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा स्वसारं वाचार्यं वा ब्राह्मणं वा किंचिद् भृशमिव प्रत्याह धिक्त्वाऽस्त्वित्येवैनमाहुः पितृहा वै त्वमसि मातृहा वै त्वमसि भ्रातृहा वै त्वमसि स्वसृहा वै त्वमस्याचार्यहा वै त्वमसि ब्राह्मणहा वै त्वमसीति ॥ २ ॥ यदि कोई (व्यक्ति) अपने पिता, माता, भाई, बहिन, आचार्य अथवा ब्राह्मण के प्रति अशिष्टतापूर्ण व्यवहार करता है, तो उसको देखने एवं सुनने वाले उसे अपमानित करते हुए कहते हैं कि तुझे धिक्कार है। सचमुच ही तू अपने माता व पिता को मारने वाला है, भ्रातृघाती है, बहिन की हत्या करने वाला है, आचार्य का हनन करने वाला है और तू निश्चय ही ब्रह्मघाती है ॥ २ ॥ अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्छूलेन समासं व्यतिषं दहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहासीति न मातृहासीति न भ्रातृहासीति न स्वसृहासीति नाचार्थहासीति न ब्राह्मणहासीति ॥ ३ ॥ परन्तु जिन लोगों के प्राण निकल गये हैं, उन माता, पिता आदि समस्त परिवारिजनों को यदि वह व्यक्ति शूल से संहृत कर एवं छिन्न-भिन्न करके जला देता है (कपाल क्रिया आदि करता है), तो भी उसे कोई यह नहीं कहता है कि तू पिता का हत्यारा, माता का हत्यारा, भाई का हत्यारा, बहिन का हत्यारा एवं आचार्य का घात करने वाला है अथवा ब्रह्म का घाती है ॥ ३ ॥ प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत ॥ ४॥ (हे नारद !) इस प्रकार माता-पिता आदि के रूप में प्राण ही होते हैं। इसलिए जो (व्यक्ति) प्राणों को इस तरह से अनुभव करता है, चिन्तनयुक्त एवं दृढ़ निश्चयी होता है, वही ‘अतिवादी’ कहा जाता है। यद्यपि कोई भी उसे ‘अतिवादी’ कहे, तो फिर उसे यह स्वीकार करना चाहिए कि वास्तव में मैं अतिवादी हूँ। इस तथ्य को उसे छुपाना नहीं चाहिए ॥ ४ ॥ ॥ षोडशः खण्डः ॥ एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानीति सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥ (हे नारद !) जो व्यक्ति सत्य के कारण अतिवाद करता है, वह अवश्य ही अतिवाद करने वाला है। (तब नारद जी ने कहा)- हे भगवन् ! मैं तो सत्य के कारण ही अतिवाद करता हूँ।