भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 505 में से

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पृष्ठ 179

अध्याय ७ खण्ड २० मन्त्र १ १७९ (सनत्कुमार जी ने कहा-) सत्य को विशेष रूप से जानना चाहिए। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन्! मैं विशेष प्रकार से सत्य को ही आत्मसात् करता हूँ॥ १ ॥ ॥ सप्तदशः खण्डः ॥ यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन् सत्यं वदति विजानन्नेव सत्यं वदति विज्ञानं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति । विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥ (सनत्कुमार जी ने कहा- हे नारद !) जब व्यक्ति सत्य को विशेष रूप से जानने में समर्थ हो जाता है, तब वह सत्य भाषण करता है। बिना जाने वह सत्य नहीं बोलता, वरन् विशेष रूप से जानने वाले सत्य का ही प्रतिपादन करता है। इसलिए हे नारद ! विज्ञान की ही विशेष रूप से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन्! मैं विशेष प्रकार से सत्य को ही आत्मसात् करता हूँ॥ १ ॥ ॥ अष्टादशः खण्डः ॥ यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥ (सनत्कुमार जी ने नारद जी को समझाते हुए कहा- हे नारद !) जब मनुष्य मनन करता है, तब कुछ विशेष जानकारियाँ प्राप्त करने में सक्षम होता है। बिना मनन किये कोई भी व्यक्ति कुछ भी नहीं जान पाता, वरन् मनन करने के पश्चात् ही जान पाता है। इसलिए हे नारद ! विशेष रूप से मति की ही जिज्ञासा करनी चाहिए। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन् ! मैं मति के सम्बन्ध में विशेष जानकारी प्राप्त करने की इच्छा करता हूँ॥ १ ॥ ॥ एकोनविंशः खण्डः ॥ यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते नाश्रद्दधन्मनुते श्रद्दधदेव मनुते श्रद्धा त्वेव विजिज्ञा- सितव्येति श्रद्धां भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥ (सनत्कुमार जी ने कहा- हे नारद !) (जब मनुष्य को किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान विशेष के प्रति) श्रद्धा उत्पन्न होती है, तब वह मनन करता है, श्रद्धा के अभाव में वह मननशील नहीं हो सकता। श्रद्धालु (व्यक्ति) ही मननशील हो सकता है। इसलिए हे नारद ! श्रद्धा को ही विशेष रूप से जानने की इच्छा करनी चाहिए। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन्! मैं श्रद्धा के सम्बन्ध में विशेष ज्ञान की इच्छा करता हूँ॥ १ ॥ ॥ विंशः खण्डः ॥ यदा वै निस्तिष्ठत्यथ श्रद्दधाति नानिस्तिष्ठञ्छ्रद्दधाति निस्तिष्ठन्नेव श्रद्दधाति निष्ठा त्वेव विजिज्ञासितव्येति । निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥ (सनत्कुमार जी ने देवर्षि नारद जी से कहा-) हे नारद! जब मनुष्य की (किसी व्यक्ति विशेष के प्रति) निष्ठा (जागृत) होती है, तभी वह उसके प्रति श्रद्धावनत होता है, निष्ठा के अभाव में कोई भी (व्यक्ति) श्रद्धायुक्त नहीं होता; बल्कि निष्ठावान् (व्यक्ति) ही श्रद्धा करने वाला होता है, (इसलिए हे नारद !) निष्ठा को ही विशेष रूप से जानने की इच्छा करनी चाहिए। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन्! मैं निष्ठा को विशेष रूप से जानने की इच्छा करता हूँ॥ १ ॥

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