१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८० छान्दोग्योपनिषद् ॥ एकविंशः खण्डः ॥ यदा वै करोत्यथ निस्तिष्ठति नाकृत्वा निस्तिष्ठति कृत्वैव निस्तिष्ठति कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति। कृतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ (सनत्कुमार जी ने कहा- हे नारद!) जब मनुष्य कोई कार्य विशेष करता है, तब वह (उसके प्रति) निष्ठावान् हो जाता है। बिना कार्य किये (व्यक्ति) की निष्ठा (उत्पन्न) नहीं होती। मनुष्य कर्म करने पर ही निष्ठावान् होता है। इसलिए (हे नारद!) कृति (अर्थात् इन्द्रियों का संयम और चित्त की एकाग्रता) को विशेष रूप से जानने की इच्छा करनी चाहिए। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन्! मैं कृति को ही विशेष रूप से जानने की इच्छा करता हूँ॥ १ ॥ ॥ द्वाविंशः खण्डः ॥ यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं लब्ध्वा करोति सुखमेव लब्ध्वा करोति सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति। सुखं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥ (सनत्कुमार जी ने कहा- हे नारद!) जिस समय व्यक्ति को सुख की प्राप्ति होती है, उस समय वह कर्म करता है, सुख के अभाव में कोई भी व्यक्ति कार्य नहीं करता, वरन् सुख प्राप्त करके ही (कुछ विशेष पाने की आशा) करता है। (इसलिए हे नारद!) सुख को ही प्राप्त करने की तथा उसे विशेष रूप से जानने की इच्छा करनी चाहिए। (नारद बोले-) हे भगवन्! मैं सुख प्राप्ति की ही विशेष रूप से जिज्ञासा करता हूँ॥ ॥ त्रयोविंशः खण्डः ॥ यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १॥ (सनत्कुमार जी ने कहा-) हे नारद! निश्चय ही जो भूमा (महान्, निरतिशय) है, वही सुख है। अल्प में सुख नहीं है। भूमा ही सुख स्वरूप है। (अतः हे नारद!) भूमा की ही विशेष रूप से जानने की इच्छा करनी चाहिए। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन्! मैं भूमा (निरतिशय) को ही विशेष रूप से जानने की इच्छा करता हूँ॥ १ ॥ ॥ चतुर्विंशः खण्डः ॥ यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ यत्रान्यत्पश्य- त्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यँ स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति। स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्रीति ॥ १ ॥ (सनत्कुमार जी नारद जी को सम्बोधित करते हुए कहते हैं- हे नारद!) जहाँ अन्य कुछ न देखता है, न अन्य कुछ सुनता है और न ही अन्य कुछ जानता है, वही भूमा है; परन्तु इसके विपरीत जहाँ अन्य कुछ देखता है, अन्य कुछ सुनता है तथा कुछ अन्य जानकारी रखता है, वह अल्प है। इस प्रकार से जो भूमा है, वही अमृत है तथा जो अल्प है, वह ही मर्त्य है। (नारद जी ने पूछा-) हे भगवन्! भूमा किसमें स्थित है ? (सनत्कुमार जी ने कहा-) भूमा अपनी महिमा में स्थित है और वास्तव में तो वह उसमें भी स्थित नहीं है अर्थात् वह अवलम्बन रहित है ॥ १ ॥