१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७ खण्ड २६ मन्त्र १ १८१ गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेवं ब्रवीमि ब्रवीमीति होवाचान्यो ह्यन्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥ (हे नारद!) इस संसार में तो गौ, अश्व आदि को ही महिमा कहा जाता है। साथ ही हाथी, सुवर्ण, दास, भार्या (पत्नी), भूमि (क्षेत्र) और घर आदि को भी महिमा के नाम से जाना जाता है; किन्तु यह मेरा कथन नहीं है, क्योंकि अन्य पदार्थ अन्य में स्थित होता है- मैं तो यही कहता हूँ। इस प्रकार से सनत्कुमार जी ने नारद जी से कहा॥ २॥ [ सनत्कुमार जी लौकिक महिमा और भूमा की महिमा में अन्तर भर स्पष्ट करना चाहते हैं, वैसे आगे भूमा के बारे में पुनः बतला रहे हैं।] ॥ पञ्चविंशः खण्डः ॥ स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स पश्चात्स पुरस्तात्स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेद१सर्व- मित्यथातोऽहङ्कारादेश एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतो- ऽहमुत्तरतोऽहमेवेद१ सर्वमिति ॥ १ ॥ (हे नारद!) वही (भूमा) नीचे है, वही ऊपर है, वही पीछे एवं आगे भी है, वही दायीं ओर और वही बायीं ओर भी है। वह (भूमा) ही यह सब कुछ है। उसी (भूमा) में अहंकारवश (व्यक्तिभाव से) इस तरह से कहते हैं- मैं ही ऊपर, मैं ही नीचे एवं मैं ही दायीं और मैं ही बायीं ओर हूँ। मैं ही दक्षिण की ओर तथा ऊपर की ओर हूँ। मैं ही सभी ओर से विद्यमान हूँ॥ १ ॥ अथात आत्मादेश एवात्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेद१ सर्वमिति। स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नात्म- रतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराड् भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति। अथ येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषा१ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥ (हे नारद!) इस तरह से सत्य स्वरूप आत्मा के रूप में ही भूमा का आदेश किया जाता है। आत्मा ही आगे-पीछे, दायीं-बायीं ओर व्याप्त है। यह आत्मा ही सब कुछ है। वह (ज्ञानी पुरुष) इस आत्मा को इस प्रकार से देखने वाला, मनन करने वाला और विशेष रूप से इस भाँति से जिज्ञासा वाला आत्मरति (आत्मा में ही क्रीड़ा करने वाला) और आत्मा में ही मिथुन एवं आत्मा में ही आनन्दानुभूति करने वाला होता है। वह ही स्वराट् (स्वप्रकाशित) है, समस्त भुवनों (लोकों) में उसकी इच्छानुसार गति होती है; किन्तु जो इससे विपरीत देखते हैं, वे ही अन्यराट् और क्षय्यलोक को प्राप्त होते हैं। उन (व्यक्तियों) की स्वेच्छानुसार गति नहीं होती ॥ २ ॥ ॥ षड्विंशः खण्डः ॥ तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आशात्मतः स्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्मत आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतोबलमात्मतोविज्ञानमात्मतो ध्यानमा-