भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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१८२ छान्दोग्योपनिषद् त्मतश्चित्तमात्मतः संकल्प आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामात्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेदं सर्वमिति ॥ १ ॥ सनत्कुमार जी ने कहा- हे नारद ! उस भूमा को जो इस तरह से देखने वाले, मनन करने वाले और जानने वाले विद्वान् होते हैं, उनके लिए आत्मा से प्राण, आत्मा से आशा, आत्मा से स्मृति, आत्मा से ही आकाश, आत्मा से ही तेज, आत्मा से जल, आत्मा से ही प्राकट्य और तिरोभाव, आत्मा से अन्न, आत्मा से बल, आत्मा से विज्ञान, आत्मा से ध्यान, आत्मा से ही चित्त, आत्मा से संकल्प , आत्मा से मन, आत्मा से ही वाणी, आत्मा से नाम, आत्मा से मन्त्र, आत्मा से कर्म और आत्मा द्वारा ही यह सब कुछ हो जाता है ॥ १ ॥ तदेष श्लोको न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखतां सर्वं ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति । स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः शतं च दश चैकश्च सहस्राणि च विंशतिराहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसस्पारं दर्शयति भगवान् सनत्कुमारस्तं स्कन्द इत्याचक्षते तं स्कन्द इत्याचक्षते ॥ २ ॥ हे नारद ! इस सन्दर्भ में यह श्लोक कहा गया है- विद्वान् (व्यक्ति) न तो मृत्यु को देखता है, न रोग को और न ही दुःख को देखता है। वह विद्वान् सभी को (आत्मा के रूप में ) ही देखता है। इसलिए वह सभी को आत्मा के रूप में ही देखता है। इसलिए वह सभी को प्राप्त हो जाता है। पहले वह एक होता है। पुनश्च वह तीन, पाँच, सात और नौ रूपों में विभाजित हो जाता है। फिर वही ग्यारह कहा गया है तथा वही सौ, दस, एक सहस्र और बीस भी होता है। आहार के शुद्ध होने पर अन्तःकरण की शुद्धि हो जाती है, अन्तःकरण की शुद्धि होने पर स्मृति निश्चल होती है और स्मृति के प्राप्त होने पर समस्त ग्रन्थियों की निवृत्ति हो जाती है। इस तरह से जिनकी वासनाएँ क्षीण हो गयी थीं, उन देवर्षि नारद जी को भगवान् योगेश्वर सनत्कुमार जी ने अज्ञानान्धकार से दूर कर आत्मज्ञान का दर्शन कराया। उन योगेश्वर सनत्कुमार जी को "स्कन्द (ऊर्ध्वगामी)" भी कहा जाता है ॥ २ ॥