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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

१८२ छान्दोग्योपनिषद् त्मतश्चित्तमात्मतः संकल्प आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामात्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेदं सर्वमिति ॥ १ ॥ सनत्कुमार जी ने कहा- हे नारद ! उस भूमा को जो इस तरह से देखने वाले, मनन करने वाले और जानने वाले विद्वान् होते हैं, उनके लिए आत्मा से प्राण, आत्मा से आशा, आत्मा से स्मृति, आत्मा से ही आकाश, आत्मा से ही तेज, आत्मा से जल, आत्मा से ही प्राकट्य और तिरोभाव, आत्मा से अन्न, आत्मा से बल, आत्मा से विज्ञान, आत्मा से ध्यान, आत्मा से ही चित्त, आत्मा से संकल्प , आत्मा से मन, आत्मा से ही वाणी, आत्मा से नाम, आत्मा से मन्त्र, आत्मा से कर्म और आत्मा द्वारा ही यह सब कुछ हो जाता है ॥ १ ॥ तदेष श्लोको न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखतां सर्वं ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति । स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः शतं च दश चैकश्च सहस्राणि च विंशतिराहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसस्पारं दर्शयति भगवान् सनत्कुमारस्तं स्कन्द इत्याचक्षते तं स्कन्द इत्याचक्षते ॥ २ ॥ हे नारद ! इस सन्दर्भ में यह श्लोक कहा गया है- विद्वान् (व्यक्ति) न तो मृत्यु को देखता है, न रोग को और न ही दुःख को देखता है। वह विद्वान् सभी को (आत्मा के रूप में ) ही देखता है। इसलिए वह सभी को आत्मा के रूप में ही देखता है। इसलिए वह सभी को प्राप्त हो जाता है। पहले वह एक होता है। पुनश्च वह तीन, पाँच, सात और नौ रूपों में विभाजित हो जाता है। फिर वही ग्यारह कहा गया है तथा वही सौ, दस, एक सहस्र और बीस भी होता है। आहार के शुद्ध होने पर अन्तःकरण की शुद्धि हो जाती है, अन्तःकरण की शुद्धि होने पर स्मृति निश्चल होती है और स्मृति के प्राप्त होने पर समस्त ग्रन्थियों की निवृत्ति हो जाती है। इस तरह से जिनकी वासनाएँ क्षीण हो गयी थीं, उन देवर्षि नारद जी को भगवान् योगेश्वर सनत्कुमार जी ने अज्ञानान्धकार से दूर कर आत्मज्ञान का दर्शन कराया। उन योगेश्वर सनत्कुमार जी को "स्कन्द (ऊर्ध्वगामी)" भी कहा जाता है ॥ २ ॥

अध्याय ८ खण्ड १ मन्त्र ५ १८३

अध्याय ८ खण्ड १ मन्त्र ५ १८३ ॥ अथ अष्टमोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश- स्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १ ॥ तदनन्तर ब्रह्मपुर (शरीर) के अन्तःक्षेत्र में जो कमल पुष्प के आकार का क्षेत्र है, उसके अन्तर्गत जो अति सूक्ष्माकाश है, उसके अन्तः क्षेत्र में जो तत्त्व विद्यमान है, उसी की खोज करनी चाहिए और उसी श्रेष्ठतम को जानने की इच्छा करनी चाहिए ॥ १ ॥ तं चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥ २ ॥ इसको सुनने के उपरान्त यदि शिष्य उन (आचार्य) से कहे कि इस ब्रह्मपुर में जो कमल के आकार का गृह है और उसमें जो अन्तराकाश है, उसके अन्दर कौन सी वस्तु है, जिसकी कि जिज्ञासा करनी चाहिए ? इस प्रकार से वे आचार्य इन सभी पूछने वाले शिष्यों से कहें ॥ २ ॥ यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितमिति ॥ ३ ॥ जितना विस्तार इस (भौतिक) आकाश का दृष्टिगोचर होता है, उतना ही हृदय के अन्तः का भी है। द्युलोक एवं पृथिवी दोनों पूर्ण रूप से इसके अन्दर समाहित हैं। इसी प्रकार अग्नि एवं वायु, सूर्य और चन्द्रमा, विद्युत् एवं नक्षत्र तथा जो भी कुछ इस लोक में विद्यमान है और जो नहीं है, वह सभी कुछ पूर्ण रूप से इसमें (आत्मा में) प्रतिष्ठित है ॥ ३ ॥ तं चेद्ब्रूयुरस्मिꣳश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वꣳ समाहितꣳ सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदैतज्जरामाप्नोति प्रध्वꣳसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥ और यदि उस (आचार्य) से शिष्यगण यह प्रश्न करें कि इस ब्रह्मपुर रूपी शरीर में यदि यह सभी कुछ पूर्णरूपेण विद्यमान है, समस्त प्राणी एवं सभी विषय इसमें ही स्थित हैं, तो जब इस शरीर में वृद्धावस्था का आगमन होता है अथवा यह विनाश को प्राप्त होता है, तो उस समय फिर क्या शेष रह जाता है ? ॥ ४ ॥ स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन्कामाः समाहिता एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥ ५ ॥ तो फिर उस (आचार्य) को कहना चाहिए कि इस (शरीर) की वृद्धावस्था से यह अन्तराकाश जीर्ण नहीं होता। इसके नष्ट हो जाने से उस (ब्रह्म) का नाश नहीं होता। यह ब्रह्मपुर सत्य है, इसमें समस्त इच्छाएँ पूर्ण रूप से स्थित हैं। यह ही आत्मा है, धर्म-अधर्म से शून्य तथा जरारहित, मृत्यु से हीन, शोकरहित, बिना भोजन की इच्छा वाला, पिपासाशून्य, सत्य की कामना से युक्त, सत्य

१८४ छान्दोग्योपनिषदः संकल्प वाला है। जिस प्रकार से प्रजा इस लोक में राजा की आज्ञानुसार आचरण करती है तथा देश या प्रदेश की इच्छा करती है, उसी प्रकार से राजा की आज्ञा से जीवन निर्वाह करती है ॥ ५॥ तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य इहात्मानमननुविद्य व्रजन्त्येताँश्च सत्यान् कामाँस्तेषाँ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवत्यथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येताँश्च सत्यान् कामाँस्तेषाँ सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ जिस प्रकार यहाँ कर्म द्वारा अर्जित लोक नष्ट हो जाता है, उसी तरह परलोक में पुण्य से प्राप्त किये गये लोक भी नष्ट हो जाते हैं। जो लोग इस लोक में आत्मा को तथा इन सभी सत्य कामनाओं को भली- भाँति जाने बिना ही दूसरे लोक को गमन कर जाते हैं, उनकी सभी लोकों में इच्छानुसार गति नहीं होती। जो इस लोक में आत्मा को तथा सत्य युक्त कामनाओं को भली-भाँति जानकर दूसरे लोक को गमन करते हैं, उनकी सभी लोकों में इच्छानुसार गति होती है ॥ ६ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ स यदि पितृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति तेन पितृलोकेन संपन्नो महीयते ॥ १ ॥ वह यदि (शरीर के परित्याग करने पर) पितृलोक की कामना वाला होता है, तो उसके द्वारा किये गये संकल्प से ही पितृगण वहाँ उपस्थित होते हैं। पितृलोक से सम्पन्न होकर वह महिमा का वर्णन करता है ॥ १ ॥ अथ यदि मातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन मातृलोकेन संपन्नो महीयते ॥ २ ॥ और यदि वह मातृलोक की इच्छा वाला होता है, तो उसकी दृढ़ इच्छा शक्ति से ही माताएँ उपस्थित हो जाती हैं। मातृलोकों के सम्बन्ध से ही वह महिमा का अनुभव करता है ॥ २ ॥ अथ यदि भ्रातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य भ्रातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन भ्रातृलोकेन संपन्नो महीयते ॥ ३ ॥ और यदि वह भ्रातृलोक की इच्छा वाला होता है, तो उसकी प्रचण्ड संकल्प शक्ति से ही समस्त भ्रातृ- समुदाय वहाँ उपस्थित हो जाता है। उस भ्रातृलोक से सम्पन्न होकर वह महान् महिमा को प्राप्त करता है ॥ ३ ॥ अथ यदि स्वसृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य स्वसारः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्वसृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ४ ॥ और यदि वह भगिनी लोक की कामना करने वाला है, तो उसकी दृढ़ इच्छा शक्ति से ही बहिनें वहाँ आ जाती हैं। उस भगिनी लोक से युक्त होकर वह महान् वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ अथ यदि सखिलोककामो भवति संकल्पादेवास्य सखायः समुत्तिष्ठन्ति तेन सखिलोकेन संपन्नो महीयते ॥ ५ ॥ और यदि वह मित्रों के लोक की कामना करने वाला हो, तो उसके दृढ़ संकल्प बल से ही मित्रगण वहाँ एकत्रित हो जाते हैं। उन मित्रगणों के लोक से सम्पन्न होकर वह महान् वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥ अथ यदि गन्धमाल्यलोककामो भवति संकल्पादेवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतस्तेन गन्धमाल्यलोकेन संपन्नो महीयते ॥ ६ ॥

अध्याय ८ खण्ड ३ मन्त्र २ १८५

अध्याय ८ खण्ड ३ मन्त्र २ १८५ और यदि वह गन्धमाल्य लोक की कामना वाला होता है, तो उसके संकल्प बल से ही गन्धमाल्यादि वहाँ एकत्रित हो जाते हैं। उस गन्धमाल्य लोक से सम्पन्न होकर वह महान् वृद्धि को प्राप्त होता है॥ ६॥ अथ यद्यन्नपानलोककामो भवति संकल्पादेवास्यान्नपाने समुत्तिष्ठतस्तेनान्नपानलोकेन संपन्नो महीयते ॥ ७॥ और यदि वह अन्न-जल से सम्बन्धित लोक की इच्छा करने वाला होता है, तो उसके संकल्प से ही अन्न-जल प्राप्त हो जाता है। उस अन्न-जल लोक के सम्बन्ध से ऐश्वर्य का अनुभव करता है॥ ७॥ अथ यदि गीतवादित्रलोककामो भवति संकल्पादेवास्य गीतवादित्रे समुत्तिष्ठतस्तेन गीतवादित्रलोकेन संपन्नो महीयते ॥ ८ ॥ और यदि वह गीत-वाद्य आदि से सम्बन्धित लोक की कामना करने वाला होता है, तो उसके द्वारा किये हुए संकल्प से ही गीत-वाद्य आदि वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। गीत-वाद्य आदि लोक से युक्त वह महान् वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ ८ ॥ अथ यदि स्त्रीलोककामो भवति संकल्पादेवास्य स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्त्रीलोकेन संपन्नो महीयते ॥ ९ ॥ और यदि वह स्त्रीलोक की इच्छा वाला होता है, तो उसकी दृढ़ संकल्प शक्ति से ही समस्त स्त्रियाँ वहाँ उसके पास एकत्रित हो जाती हैं। उस स्त्रियों के लोक से युक्त वह वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ यं यमन्तमभिकामो भवति यं कामं कामयते सोऽस्य संकल्पादेव समुत्तिष्ठति तेन संपन्नो महीयते ॥ १० ॥ वह जिस-जिस क्षेत्र या प्रदेश की कामना करता है तथा साथ ही जिस भोग-प्राप्ति की इच्छा करता है, वह सभी कुछ उसके संकल्प मात्र से उसे प्राप्त हो जाता है। उन सभी से युक्त वह महान् महिमा अथवा वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ १० ॥ ॥ तृतीयः खण्डः ॥ त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषां सत्यानां सतामनृतमपिधानं यो यो ह्रास्येतः प्रैति न तमिह दर्शनाय लभते ॥ १ ॥ वे ये सत्यकाम होते हुए भी अनृत (मिथ्या आदि) तृष्णा से आवृत्त रहते हैं। सत्य होने पर भी अनृत से वे आच्छादित हैं, क्योंकि मनुष्य के जो -जो सम्बन्धी यहाँ से शरीर का परित्याग करके जाते हैं, उन्हें वह पुनः देखने के लिए प्राप्त नहीं कर पाता ॥ १ ॥ अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन्न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानास्तद्यथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि संचरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥ २ ॥ इसके पश्चात् मनुष्य अपने जीवित या मृत (पुत्रादि) परिजनों को तथा अन्य वांछित पदार्थों को चाहते हुए भी नहीं प्राप्त कर पाता। उन सभी को यह मनुष्य हृदयरूपी आकाश में स्थित ब्रह्म को जानकर प्राप्त कर

१८६ छान्दोग्योपनिषद् लेता है; क्योंकि यहाँ से सत्यकाम मिथ्या से आच्छादित रहते हैं। इस सन्दर्भ में यह उदाहरण है कि जिस प्रकार भूमि में गड़े हुए स्वर्ण के कोष को अनभिज्ञ व्यक्ति उसके ऊपर विचरण करते हुए भी नहीं जानते; ठीक इसी तरह यह समस्त प्रजा नित्य प्रति ब्रह्मलोक को गमन करती हुई, उसे नहीं प्राप्त कर पाती, क्योंकि यह अनृत (मिथ्या) के माध्यम से हरण कर ली गई है ॥ २ ॥ स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तꣳ हृदयमिति तस्माद्धृदयमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमिति ॥ ३ ॥ वह आत्मा हृदय में ही स्थित है। 'हृदय' का अर्थ 'हृदि अयम्' अर्थात् यह हृदय में है। यही इसकी निरुक्ति (व्युत्पत्ति) है। इस तरह से जो व्यक्ति आत्मतत्त्व को हृदय में जानता है, वह प्रतिदिन स्वर्गलोक में ही गमन करता है ॥ ३ ॥ अथ य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभि- निष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति ॥ ४॥ यह जो सम्प्रसाद अर्थात् निर्मलता को प्राप्त आत्मा है, वह इस शरीर का परित्याग करके उत्कृष्ट अवस्था (परम ज्योति) को प्राप्त करते हुए अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है। यही आत्मा है। यही अमृत और अभय है। यही ब्रह्म है। इस प्रकार आचार्य ने अपने शिष्यों से कहा- उस ब्रह्म का नाम ही सत्य है ॥ ४ ॥ तानि ह वा एतानि त्रीण्यक्षराणि सतीयमिति तद्यत्सत्तदमृतमथ यत्ति तन्मर्त्यमथ यद्यं तेनोभे यच्छति यदनेनोभे यच्छति तस्माद्यमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमिति ॥ ५ ॥ उस ब्रह्म के तीन नामाक्षर 'सकार' 'तकार' और 'यम्' हैं। इनमें 'सकार' अमृत है, 'तकार' मर्त्य है और 'यम्' दोनों का नियामक है। चूँकि इसी से वह दोनों का नियमन करता है। अतः 'यम्' को जो भी व्यक्ति इस तरह से जानता है, वह स्वर्गलोकगामी होता है ॥ ५ ॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसंभेदाय नैतꣳ सेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुष्कृतꣳ सर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः ॥ पृथ्वी आदि लोकों को महाविनाश से बचाये रखने के लिए यह आत्मा सेतु का कार्य करता है। इस आत्मा रूप सेतु का दिन-रात उल्लंघन नहीं कर सकते। इसे जरा, मृत्यु, शोक, सुकृत और दुष्कृत भी प्रभावित नहीं करते। समस्त पाप इससे दूर हट जाते हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक पापरहित है ॥ १ ॥ तस्माद्वा एतꣳ सेतुं तीर्त्वान्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो भवत्युपतापी सन्ननुपतापी भवति तस्माद्वा एतꣳ सेतुं तीर्त्वापि नक्तमहरेवाभिनिष्पद्यते सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः ॥ २ ॥ इसी कारण से इस सेतु रूप आत्मा को प्राप्त करके मनुष्य अन्धा होने पर भी सब कुछ देखता (जानता) रहता है। इसी तरह शोकग्रस्त होने पर भी (वह) शोक मुक्त हो जाता है। रोगग्रस्त होते हुए भी वह निरोगी होता है। इसी कारण से आत्मारूपी सेतु को पार करने के उपरान्त अन्धकाररूपी रात्रि भी प्रकाशरूपी दिन में परिणत हो जाती हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक सदैव प्रकाश स्वरूप ही है ॥ २ ॥

अध्याय ८ खण्ड ६ मन्त्र १ १८७

अध्याय ८ खण्ड ६ मन्त्र १ १८७ तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषाग् सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ३ ॥ इस प्रकार से जो मनुष्य ब्रह्मचर्य के माध्यम से इस ब्रह्मलोक को भली-भाँति समझ लेते हैं। उन लोगों को इस ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। उन्हीं की सम्पूर्ण लोकों में इच्छानुसार गति हो जाती है॥ ३ ॥ ॥ पञ्चमः खण्डः ॥ अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दतेऽथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्वात्मानमनुविन्दते ॥ १ ॥ इस प्रकार जिसको 'यज्ञ' अर्थात् श्रेष्ठ पुरुषार्थ का साधन कहते हैं, वही ब्रह्मचर्य है, क्योंकि जो ज्ञाता है, ब्रह्मचर्य के माध्यम से उस ब्रह्मलोक को प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मचर्य को 'इष्ट' भी कहा गया है। वह (इष्ट) भी ब्रह्मचर्य है; क्योंकि ब्रह्मचर्य द्वारा ही पूजित हुआ मनुष्य इच्छानुसार आत्मा को प्राप्त होता है॥ अथ यत्सत्त्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येव सत आत्मनस्त्राणं विन्दतेऽथ यन्मौनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येवात्मानमनुविद्य मनुते ॥ २ ॥ जिसे 'सत्त्रायण' शब्द से जाना जाता है, वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि यज्ञ और इष्ट की भाँति ब्रह्मचर्यरूप साधन द्वारा भी मनुष्य सत्रूप परमात्मा से अपनी रक्षा करता है। इसके अतिरिक्त जिसको मौन कहा जाता है, वह भी ब्रह्मचर्य ही है। ब्रह्मचर्य द्वारा ही आत्मा को जानकर मनुष्य मनन करता है॥ २॥ अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणा- नुविन्दतेऽथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्तदरश्च ह वै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि तदैरं मदीयग् सरस्तदश्वत्थः सोमसवनस्तदपराजिता पूर्ब्रह्मणः प्रभुविमितग् हिरण्मयम् ॥ ३ ॥ तत्पश्चात् जिसे 'अनाशकायन' (कृच्छ्र चान्द्रायण आदि व्रत या नष्ट न होना) कहते हैं, वह भी ब्रह्मचर्य है, क्योंकि जिसे (साधक को) ब्रह्मचर्य द्वारा प्राप्त होता है, ऐसा यह आत्मा विनाश को नहीं प्राप्त होता। जिसको 'अरण्यायन' (वनवास) कहते हैं, वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मलोक में 'अर' एवं 'ण्य' नामक दो समुद्र हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ से तृतीय द्युलोक में 'ऐरंमदीय' (हर्षोत्पादक) नाम वाला सरोवर विद्यमान है। वही सोमसवन नामक अश्वत्थ (अमृत स्त्रावि वृक्ष) है, वहाँ पर ब्रह्मा की अपराजिता नाम की पुरी है तथा वहाँ ही प्रभु के द्वारा विशेष रूप से रचित स्वर्ण के समान मण्डप विद्यमान है॥ ३ ॥ तद्य एवैतावरं च ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषाग् सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ४ ॥ वहाँ उस ब्रह्मलोक में जो भी मनुष्य ब्रह्मचर्य के माध्यम से 'अर' तथा 'ण्य' नामक दोनों समुद्रों को प्राप्त करते हैं, उन्हीं को इस ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। उन मनुष्यों की समस्त लोकों में इच्छानुसार गति हो जाती है॥४॥ ॥ षष्ठः खण्डः ॥ अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष पीत एष लोहितः ॥ १ ॥

१८८ छान्दोग्योपनिषद् जो (कमलाकार वाले) हृदय से सम्बन्धित नाड़ियाँ हैं, ये सब पिंगल नामक एक वर्ण विशेष से युक्त सूक्ष्म रस से सम्पन्न हैं। ये (सभी) शुक्ल, नीली, पीली और लोहित रस से युक्त हैं, क्योंकि यह आदित्य पिङ्गल वर्ण का है। यही आदित्य शुक्ल है तथा यही नील वर्ण का है। यही पीला है और यही लोहित वर्ण भी है ॥ १ ॥ [इसी उपनिषद् में अध्याय ३ के खण्ड १ से ५ तक आदित्य के विभिन्न वर्णों, पक्षों तथा उससे सम्बद्ध अमृत प्रवाहों का वर्णन किया गया है। यहाँ उस वर्णन की संगति बैठती है। स्पष्ट है कि यह आदित्य सूर्य से भिन्न कोई सर्वत्र संचरित स्व प्रकाशित आत्मतत्त्व सदृश ही कुछ है।] तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छतीमं चामुं चैवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात्प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥ २॥ प्रस्तुत विषय में यह उल्लेख है- जिस तरह से कोई विशाल महापथ इस (समीप) एवं उस (दूर) दोनों ग्रामों को पहुँच जाता है, ठीक उसी प्रकार से सूर्य की ये समस्त किरणें इस (मनुष्य) में और उस (आदित्य मण्डल) में (दोनों लोकों में) प्रवेश करती हैं। वे (रश्मियाँ) सदैव इस आदित्य से ही निःसृत होकर समस्त नाड़ियों में व्याप्त हो जाती हैं और जो इन नाड़ियों से निःसृत होती हैं, वे सभी इस आदित्य में व्याप्त हो जाती हैं ॥ २ ॥ तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्यासु तदा नाडीषु सृप्तो भवति तन्न कश्चन पाप्मा स्पृशति तेजसा हि तदा संपन्नो भवति ॥ ३ ॥ इस प्रकार जब सुप्तावस्था में अच्छी तरह से तल्लीन हुआ व्यक्ति प्रसन्न होकर स्वप्न नहीं देखता, उस समय यह इन नाड़ियों में गमन कर जाता है, ऐसी स्थिति में इसे अन्य कोई पाप स्पर्श नहीं करता। यह (व्यक्ति) तेज से सम्पन्न हो जाता है ॥ ३ ॥ अथ यत्रैतदबलिमानं नीतो भवति तमभित आसीना आहुर्जानासि मां जानासि मामिति स यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति तावज्जानाति ॥ ४ ॥ जिस समय यह मनुष्य शरीर से बलरहित होता है, उस समय उसके चारों ओर बैठे हुए समस्त स्वजन सम्बन्धी कहते हैं- क्या तुम मुझे पहचानते हो ? क्या तुम मुझे पहचानते हो ? वह जब तक शरीर से बाहर उत्क्रमण नहीं करता, तब तक उन (सम्बन्धियों) को पहचानता रहता है ॥ ४ ॥ अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद्वा मीयते स यावत्क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम्॥ तत्पश्चात् जब वह जीव शरीर से बाहर निकलता है, तब इन रश्मियों से ही ऊर्ध्व की ओर गमन करता है। वह 'ॐ' इस प्रकार कहकर आत्मा का ध्यान करता हुआ ऊर्ध्व अथवा अधोलोक की ओर गमन करता है। वह (जीवात्मा) आदित्य नामक लोक में उतनी ही देर में पहुँच जाता है, जितनी देर में मन गमन करता है। निश्चित ही यह आदित्य ही समस्त लोकों का द्वार है। यह साधक मनीषियों के लिए ब्रह्मलोक की प्राप्ति का द्वार और अज्ञानियों को रोकने वाला है ॥ ५ ॥ तदेष श्लोकः। शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका। तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्‍ङन्या उत्क्रमणे भवन्त्युत्क्रमणे भवन्ति ॥ ६ ॥ इस सम्बन्ध में एक मन्त्र उल्लिखित है- हृदय में एक सौ एक नाड़ियों का समावेश है। उन नाड़ियों

अध्याय ८ खण्ड ७ मन्त्र ४ १८९

अध्याय ८ खण्ड ७ मन्त्र ४ १८९ में से एक नाड़ी 'सुषुम्ना' मूर्धा (मस्तिष्क) की ओर निकल गई है। उस (सुषुम्ना) के द्वारा ऊर्ध्व की ओर गमन करने वाला जीव अमृतत्व को प्राप्त होता है। शेष अन्य यत्र-तत्र गमन करने वाली नाड़ियाँ केवल उत्क्रमण अर्थात् बाहर निकलने की हेतुभूता, (सुषुम्ना के अतिरिक्त उन सभी नाड़ियों से ऊर्ध्व लोकों की प्राप्ति नहीं होती है) ॥ ६॥ ॥ सप्तमः खण्डः ॥ य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ॥ १॥ (अब आत्मा के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए इन्द्र और विरोचन की आख्यायिका का वर्णन करते हैं। प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा-) जो आत्मा पापशून्य, जरारहित, मृत्यु से रहित, विशोक (शोक रहित), क्षुधारहित, पिपासारहित, सत्यकाम और सत्य संकल्प से युक्त है, उसे खोजना चाहिए, विशेष रूप से जानने का प्रयास करना चाहिए। जो उस आत्मा की अनुभूति प्राप्त करता है, वह सभी लोकों तथा समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है ॥ १॥ तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामानितीन्द्रो हैव देवानामभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणां तौ हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापतिसकाशमाजग्मतुः ॥ २॥ (प्रजापति ब्रह्मा जी के इस व्याख्यान को) देव और असुर दोनों ने (कर्ण परम्परा से) जाना। उन्होंने कहा कि उस आत्मा की जिज्ञासा करनी चाहिए। जिसके जानने से सभी लोकों और भोगों को प्राप्त किया जाता है। ऐसा सोचकर देवों के राजा इन्द्र और दैत्यों के राजा विरोचन दोनों आपस में सद्भाव न रखते हुए, (भी) हाथों में समिधाएँ लेकर (समित्पाणि होकर) प्रजापति के पास पहुँचे ॥ २॥ तौ ह द्वात्रिंशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्ता-ववास्तमिति । तौ होचतुर्य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति भगवतो वचो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ॥ वे दोनों ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए प्रजापति के पास ३२ वर्ष तक रहे। तत्पश्चात् प्रजापति ने उनसे कहा- आप सभी ने किस उद्देश्य विशेष की पूर्ति हेतु यहाँ वासस्थल बनाया है। उन दोनों ने कहा- जो आत्मा पापरहित, जरारहित, मृत्युरहित, शोक रहित, क्षुधा रहित, तृषारहित, सत्यकाम तथा सत्य संकल्प से युक्त है, वही जानने एवं अनुभव करने योग्य है, जो उस आत्मा को जानता एवं अनुभव करता है, वह समस्त लोकों और भोगों को प्राप्त करता है। आपके इस तरह के उपदेश को सभी श्रेष्ठ लोग कहते हैं। हम सभी (देव एवं असुरगणों) ने उसी श्रेष्ठ आत्मा को जानने के लिए यहाँ वास किया है ॥ ३ ॥ तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतम- भयमेतद्ब्रह्मेत्यथ योऽयं भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादर्शे कतम एष इत्येष उ एवैषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायत इति होवाच ॥ ४॥

॥ अष्टमः खण्डः ॥

१९० छान्दोग्योपनिषद् प्रजापति ने कहा- आँख के अन्दर पुरुष के रूप में जो दृष्टिगोचर होता है, यही आत्मा है और यही अभय एवं ब्रह्मरूप है। उन्होंने प्रतिच्छाया को ही आत्मा समझकर प्रश्न किया कि - हे भगवन्! यह जो जल एवं दर्पण में सब ओर दृष्टिगोचर होता है, उसके अन्तर्गत आत्मा कौन सा है ? तब प्रजापति ने बताया- हमने चक्षुओं के अन्दर जो द्रष्टा कहा है, वही इन सभी में दिखाई पड़ता है ॥ ४ ॥ ॥ अष्टमः खण्डः ॥ उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानीथस्तन्मे प्रब्रूतमिति तौ होदशरावेऽ- वेक्षांचक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथेति तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आलोमभ्य आनखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ १ ॥ प्रजापति ने उन दोनों से कहा कि जल से परिपूर्ण पात्र में स्वयं अपने को देखकर तुम आत्मा के सन्दर्भ में जो भी कुछ न जान सको, वह मुझसे कहो। इस प्रकार उन दोनों ने जल से पूर्ण पात्र में दृष्टिपात किया। उन दोनों से प्रजापति ने कहा- तुम क्या देखते हो ? तब उन्होंने कहा- भगवन्! हम अपने शरीर के रोम (केश) से लेकर नख पर्यन्त प्रतिबिम्ब रूप में इस आत्मा को देखते हैं ॥ १ ॥ तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामिति तौ ह साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षांचक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति ॥ २ ॥ प्रजापति ने उन दोनों से कहा- तुम सुन्दर आभूषण एवं वस्त्रों से समलंकृत होकर तथा सम्पूर्ण शरीर को परिष्कृत करने के पश्चात् जल के अन्दर देखो। उन दोनों ने प्रजापति के कथनानुसार ही समस्त अलंकरणों एवं शुभ्र वस्त्रों को धारण कर और परिष्कृत होकर जल पात्र में देखा। तभी प्रजापति ने पुनः प्रश्न किया कि तुम दोनों क्या देख रहे हो ? ॥ २ ॥ तौ होचतुर्यथैवेदमावां भगवः साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ स्व एवमेवेमौ भगवः साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतावित्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तौ ह शान्तहृदयौ प्रवव्रजतुः ॥ ३ ॥ उन दोनों (इन्द्र और विरोचन) ने प्रजापति से कहा- हे भगवन् ! जिस तरह हम दोनों उत्तम अलकारों एवं शुभ्र परिधानों से युक्त एवं परिष्कृत हैं, वैसे ही ये दोनों जल के मध्य में दिखाई पड़ने वाले प्रतिबिम्ब भी उत्तम आभूषणों एवं शुभ्र वस्त्रों से युक्त एवं परिष्कृत हैं। तदनन्तर प्रजापति ने कहा- यही आत्मा है, यही अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है। तत्पश्चात् वे दोनों शान्त चित्त होकर चले गये ॥ ३ ॥ [ वे दोनों प्रजापति के कथन के मर्म को समझ न सके तथा विम्ब में दृश्यमान स्थूल काया को ही आत्मा के रूप में समझकर लौट पड़े। प्रजापति उनके अज्ञान को समझ गये।] तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचानुपलभ्यात्मानमनुविद्य व्रजतो यतर एतदुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वासुरा वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्तहृदय एव विरोचनोऽसुराञ्जगाम तेभ्यो हैतामुपनिषदं प्रोवाचात्मैवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महयन्नात्मानं परिचरन्नुभौ लोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ॥ ४ ॥ प्रजापति ने उन दोनों को (दूर जाता हुआ) देखकर कहा- ये दोनों (इन्द्र एवं विरोचन) आत्मा को

अध्याय ८ खण्ड ९ मन्त्र २ १९१

अध्याय ८ खण्ड ९ मन्त्र २ १९१ प्राप्त किये बिना अर्थात् उस आत्मतत्त्व का साक्षात्कार किये बिना ही जा रहे हैं। देव हों अथवा असुर जो भी आत्मा के सम्बन्ध में ऐसा सोचने वाले होंगे, उनका पतन अवश्य होगा। उस विरोचन ने शान्त भाव से असुरों के सम्मुख जाकर प्रजापति के द्वारा बतायी हुई आत्म विद्या को कह सुनाया। उसने कहा- इस लोक में यह (देह ही) आत्मा है तथा आत्मा ही सेवा के योग्य है। आत्मा की सेवा एवं परिचर्या करने वाला पुरुष इहलोक एवं परलोक दोनों को प्राप्त कर लेता है ॥ ४॥ तस्मादप्यद्येहाददानमश्रद्दधानमयजमानमाहुरासुरो बतेत्यसुराणाꣳ ह्येषोपनिषत्प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसनेनालंकारेणेति संस्कुर्वन्त्येतेन ह्यमुं लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥ ५॥ यही कारण है कि संसार में जो (व्यक्ति) दान नहीं देता, श्रद्धा नहीं रखता और न ही यजन करता है, उसे श्रेष्ठ जन इस प्रकार कहते हैं- अरे यह तो आसुरी वृत्ति वाला है। यह उपनिषद् (विद्या) असुरों की ही है। वे ही मृत व्यक्ति के शरीर को (गन्ध-पुष्प-अन्न आदि) भिक्षा, वस्त्र एवं आभूषणों से विभूषित करते हैं। इसके द्वारा ही हम स्वर्गलोक को प्राप्त करेंगे-ऐसा मानते हैं ॥ ५॥ ॥ नवमः खण्डः ॥ अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलंकृते साध्वलंकृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ १ ॥ जब तक इन्द्रदेव देवों के पास पहुँचें, इससे पूर्व उन्हें (यथार्थ बोध से) यह भय प्रकट हुआ कि जिस प्रकार इस शरीर के अलंकृत किये जाने पर इसका प्रतिबिम्ब भी अलंकृत होता है, वस्त्रों से सुसज्जित होने पर वह भी सज्जित होता है और परिष्कृत किये जाने पर वह भी परिष्कृत होता है, उसी प्रकार इस शरीर के अन्धे हो जाने पर प्रतिबिम्ब शरीर भी अन्धा हो जाता है, स्राम (विकार स्रावित करने वाला) होने पर स्राम हो जाता है, अपङ्ग होने पर अपङ्ग हो जाता है तथा इस शरीर के नष्ट होने पर वह भी विनष्ट हो जाता है, अतः इस प्रतिबिम्ब शरीर में मुझे कुछ भी भोगने योग्य (श्रेष्ठ प्रतिफल) नहीं दिखाई पड़ता ॥ १ ॥ स समित्पाणिः पुनरेयाय तꣳ ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः सार्धं विरोचनेन किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच यथैव खल्वयं भगवोऽस्मिञ्छरीरे साध्वलंकृते साध्वलंकृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायम- स्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥ तब इन्द्रदेव पुनः समिधा हाथ में लेकर प्रजापति के सम्मुख उपस्थित हुए। उनसे प्रजापति ने पूछा- हे इन्द्र! तुम तो विरोचन के साथ हृदय से सन्तुष्ट हो गये थे, अब फिर किस इच्छा से लौटे हो? उन्होंने कहा- भगवन्! जिस प्रकार इस शरीर के अलंकृत होने पर इसका प्रतिबिम्ब भी अलंकृत होता है। सुन्दर वस्त्रों से सज्जित किये जाने पर वह भी सज्जित होता है। स्वच्छ किये जाने पर वह भी स्वच्छ होता है, उसी प्रकार इसके अंधे होने पर वह भी अन्धा होता है, स्राम होने पर स्राम हो जाता है, अपङ्ग होने पर अपङ्ग हो जाता है तथा इस शरीर के नष्ट होने पर वह भी विनष्ट हो जाता है, अतएव मुझे इसमें कुछ भी भोगने योग्य (श्रेष्ठ प्रतिफल) नहीं दिखाई पड़ता ॥ २ ॥

१९२ छान्दोग्योपनिषद एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै होवाच ॥ ३ ॥ देव प्रजापति ने इन्द्रदेव से कहा- हे इन्द्र ! यह यथार्थ तथ्य ऐसा ही है, मैं तुम्हारे लिए इसकी व्याख्या आगे करूँगा। अब तुम बत्तीस वर्ष यहाँ और वास करो। तब इन्द्रदेव ने वहाँ बत्तीस वर्ष व्यतीत किये। फिर प्रजापति ने उन्हें उपदेश दिया॥ ३॥ ॥ दशमः खण्डः ॥ य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श तद्यद्यपीदं शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ १ ॥ 'जो स्वप्न में भी विचरणशील तत्त्व है, जो अत्यन्त पूज्यमान आत्मा है, वही अविनाशी, अभय और ब्रह्म है।' इन वचनों से संतुष्ट होकर शान्त हृदय से इन्द्रदेव चले गये; परन्तु देवों तक पहुँचने के पूर्व उनमें (यथार्थ बोध से) भय व्याप्त हुआ। यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है, परन्तु वह स्वप्न शरीर (अन्तर्मन) अनन्ध होता है और यह स्राम होता है, तो वह अस्राम रहता है। शरीर के दोषों से वह दोष मुक्त रहता है॥ न वधेनास्य हन्यते नास्य स्राम्येण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥ वह इस देह के वध से विनष्ट भी नहीं होता और वह इसकी स्रामता से स्राम भी नहीं होता; किन्तु स्वप्न में भी ऐसा भान होता है कि कोई उसे मार रहा है, तिरस्कृत कर रहा है अथवा वह शोक कर रहा है अथवा वह रो रहा है, अतएव इसमें मुझे भोगने योग्य (श्रेष्ठ प्रतिफल) कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता॥ स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन्द्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच तद्यद्यपीदं भगवः शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ ३ ॥ वे (इन्द्रदेव) पुनः देव प्रजापति के पास हाथ में समिधा लेकर आये। देव प्रजापति ने उनसे कहा- हे इन्द्र ! तुम तो यहाँ से सन्तुष्ट होकर शान्त हृदय से गये थे, फिर किस इच्छा से लौटे हो? उन्होंने कहा- भगवन्! यद्यपि यह शरीर अंधा होता है, तो भी वह (स्वप्न में विचरणशील अन्तर्मन) अनन्ध रहता है और यह स्राम होता है, तो भी वह अस्राम रहता है। इस प्रकार वह शरीर के दोषों से दोषमुक्त ही रहता है॥३॥ न वधेनास्य हन्यते नास्य स्राम्येण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं पश्यामीत्येवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै होवाच ॥ ४॥ इसके वध से उसका वध नहीं होता है और इसकी स्रामता से वह स्राम नहीं होता; परन्तु ऐसा अनुभव होता है कि कोई उसे मारता है, तिरस्कृत करता है, वह शोक करता है अथवा रोदन करता है।

अध्याय ८ खण्ड ११ मन्त्र ३ २९३

अध्याय ८ खण्ड ११ मन्त्र ३ २९३ इसमें मुझे कुछ भी भोगने योग्य (श्रेष्ठ प्रतिफल) दिखाई नहीं पड़ता। तब देव प्रजापति ने इन्द्रदेव से कहा- हे इन्द्र ! यह तथ्य ऐसा ही है। इस आत्मतत्व की व्याख्या मैं आगे करूँगा, अभी तुम बत्तीस वर्ष और यहाँ वास करो। तब इन्द्रदेव ने वहाँ बत्तीस वर्ष व्यतीत किया। फिर देव प्रजापति ने उन्हें उपदेश दिया ॥ ॥ एकादशः खण्डः ॥ तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतम- भयमेतद्ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श नाह खल्वयमेवः संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ १ ॥ 'जब यह प्रसुप्त अवस्था में सम्पूर्ण रूप से आनन्दित और शान्त रहता है और स्वप्न का अनुभव भी नहीं करता, वही आत्मा है। वही अनश्वर, अभय और ब्रह्म है'। इन वचनों को सुनकर इन्द्रदेव सन्तुष्ट होकर शान्त हृदय से चले गये; किन्तु देवों तक पहुँचने के पूर्व उनमें फिर (यथार्थ बोध से) भय प्रकट हुआ। उस अवस्था में तो उसे निश्चय ही यह बोध नहीं रहता कि यह मैं हूँ और न वह अन्य प्राणियों को जानता है, उस अवस्था में तो वह विनाश जैसी स्थिति को प्राप्त हो जाता है। इसमें मुझे कुछ भी भोगने योग्य (श्रेष्ठ प्रतिफल) नहीं दिखाई पड़ता ॥ १ ॥ स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन्पुनरागम इति स होवाच नाह खल्वयं भगव एवः संप्रत्यात्मानं जानात्यय- महमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥ (इस प्रकार विचार करते हुए) देवराज इन्द्र पुनः प्रजापति के पास हाथ में समिधा लेकर पहुँचे। उन्हें देखकर प्रजापति ने पूछा- हे इन्द्र ! तुम तो स्थिर चित्त होकर चले गये थे, अब पुनः हमारे पास किस इच्छा से आये हो ? इन्द्र ने कहा- 'हे भगवन् !' इस स्थिति में तो निश्चय ही इसे यह भी आभास नहीं होता कि स्वयं ही यह मैं हूँ। न यह इन अन्य दूसरे भूतों (प्राणियों) को जानता है। यह निश्चय ही विनाश सा हो जाता है। इसमें मुझे इष्ट दृष्टिगोचर नहीं होता ॥ २ ॥ एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्मा- द्वसापराणि पञ्च वर्षाणीति स हापराणि पञ्च वर्षाण्युवास तान्येकशतं संपेदुरेतत्तद्य- दाहुरेकशतं ह वै वर्षाणि मघवान्प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास तस्मै होवाच ॥ ३ ॥ प्रजापति ने पुनः उपदेश देते हुए इन्द्र से कहा- हे इन्द्र ! 'यह बात ऐसी ही है'। अब मैं तुम्हें पुनः समझाइएा । अभी तुम पाँच साल तक यहाँ पर और ब्रह्मचर्य पूर्वक निवास करो। तदनन्तर देवराज इन्द्र ने पाँच साल तक निवास किया। यह सभी वर्ष मिलाकर एक सौ एक वर्ष हो गये। इसी से कहते हैं कि इन्द्र ने प्रजापति के यहाँ एक सौ एक वर्ष तक ब्रह्मचर्य पूर्वक निवास किया तत्पश्चात् प्रजापति ने कहा ॥ ३ ॥

॥ द्वादशः खण्डः ॥

१९४ छान्दोग्यापानषद ॥ द्वादशः खण्डः ॥ मघवन्मर्त्यं वा इदँशरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्यात्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां न वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥ १ ॥ हे इन्द्र ! यह शरीर मरणधर्मा एवं सदैव मृत्यु से आच्छादित है। अविनाशी एवं अशरीरी आत्मा का यह (शरीर) वास स्थल है। सशरीर आत्मा निश्चय ही प्रिय एवं अप्रिय से घिरा हुआ है, शरीर युक्त होते हुए इसके प्रिय व अप्रिय का विनाश नहीं होता। साथ ही अशरीर (शरीररहित) होने पर प्रिय और अप्रिय इसका स्पर्श रञ्च मात्र भी नहीं कर सकते ॥ १ ॥ अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत्तस्तनयित्नुरशरीराण्येतानि तद्यथैतान्यमुष्मादाकाशात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥ २ ॥ वायु शरीर से रहित है, अभ्र (बादल), विद्युत् और मेघ की गर्जना भी अशरीरी है। जिस तरह ये सभी उस आकाश से ऊपर उठकर सूर्य (सविता) की परम ज्योति को प्राप्त कर अपने स्वरूप में परिणत हो जाते हैं ॥ २ ॥ एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभि- निष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः स तत्र पर्येति जक्षत्क्रीडन्रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वाज्ञातिभिर्वा नोपजनँ स्मरन्निदँ शरीरँ स यथा प्रयोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्छरीरे प्राणो युक्तः ॥ ३ ॥ उसी तरह यह सम्प्रसाद (जीव) आकाश से वायु आदि की भाँति इस शरीर से ऊर्ध्व की ओर उठकर परम ज्योति को पाकर अपने आत्मस्वरूप में केन्द्रित हो जाता है। वह ही उत्तम पुरुष है, ऐसी अवस्था में वह (जीव) हँसता, क्रीड़ा करता और स्त्री, यान अथवा ज्ञातिजनों (बन्धुओं) के साथ रमण करता हुआ अपने साथ प्रकट हुए इस शरीर को स्मरण न करता हुआ, सभी ओर संचरित होता है। जैसे अश्व अथवा वृषभ गाड़ी में जुता रहता है, ठीक वैसे ही यह प्राण रथ स्थानीय शरीर में जुता हुआ है ॥ ३ ॥ अथ यत्रैतदाकाशमनुविषण्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माभिव्याहाराय वागथ यो वेदेदँ शृणवानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥ जहाँ जाग्रत् अवस्था में वह चक्षु द्वारा उपलक्षित आकाश रूप में अनुगत है, वह ही चाक्षुष अर्थात् चक्षु में रहने वाला पुरुष है। उसके ज्ञान के साधन नेत्र हैं। जो यह अनुभव करता है कि मैं इसे सूँघूँ यानी ग्रहण करूँ; वही आत्मा है। उसके गन्ध ग्रहण के लिए नासिका है तथा जो जानता है कि मैं यह शब्द उच्चारण करूँ, वह ही आत्मा है। उसके वाक्योच्चारण के लिए वाणी है और जो यह समझता है कि मैं यह श्रवण करूँ, वह भी आत्मा ही है और उसके सुनने के साधन स्वरूप श्रोत्रेन्द्रिय है ॥ ४ ॥ अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा मनोऽस्य दैवं चक्षुः स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते ॥ ५ ॥

अध्याय ८ खण्ड १४ मन्त्र १ १९५

अध्याय ८ खण्ड १४ मन्त्र १ १९५ और जो यह अनुभव करता है कि मैं मनन करूँ, वही आत्मा है। मन ही उसका दिव्य चक्षु है। वह यह आत्मा इस दिव्य नेत्र द्वारा भोगों का दर्शन करता हुआ रमण करता है ॥ ५ ॥ य एते ब्रह्मलोके तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात्तेषाँ सर्वे च लोका आत्ताः सर्वे च कामाः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच ॥ ६ ॥ और जो यह सभी प्रकार के भोग इस ब्रह्मलोक में विद्यमान हैं। उन्हें वह देखता हुआ रमण करता है। उस महान् आत्मा की देवगण उपासना करते हैं। इसी कारण से उन्हें समस्त लोक और सभी तरह के भोग प्राप्त हैं। जो भी उस आत्मा को शास्त्र और आचार्य के उपदेशानुसार समझकर प्रत्यक्ष रूप से समझता है, वह सभी लोक और सभी तरह के भोगों को पा जाता है, ऐसा प्रजापति ने कहा ॥ ६ ॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छ्यामं प्रपद्येऽश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात्प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसंभवामीत्यभिसंभवामीति ॥ मैं शरीर के नष्ट होने के पश्चात् श्याम (हृदय कमल में स्थित) ब्रह्म से शबल (ब्रह्मलोक) को प्राप्त करूँ। साथ ही शबल ब्रह्मलोक से श्याम को प्राप्त करूँ। जिस तरह अश्व अपने रोमों को झाड़कर स्वच्छ एवं मलरहित हो जाता है, उसी प्रकार मैं पापों से निवृत्त होकर राहु के मुख से प्रकट हुए चन्द्रमा की भाँति शरीर का परित्याग कर कृतकृत्य होता हूँ। इस प्रकार मैं अकृत ब्रह्म को प्राप्त करता हूँ, ब्रह्मलोक को प्राप्त करता हूँ॥ १ ॥ ॥ चतुर्दशः खण्डः ॥ आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतँ स आत्मा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशो विशां यशोऽहमनुप्रापत्सि स हाहं यशसां यशः श्येतमदत्कमदत्कँ श्येतं लिन्दु माभिगां लिन्दु माभिगाम् ॥ १ ॥ 'आकाश' इस नाम से श्रुतियों में प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूप का निर्वाह करने वाला है। वे (नाम एवं रूप) जिस (ब्रह्म) के अन्तर्गत हैं, वही ब्रह्म है, वही आत्मा है और वही अमृत है। मैं प्रजापति के सभागृह को प्राप्त करता हूँ, यश रूप आत्मा हूँ, मैं ही ब्राह्मणों के यश, क्षत्रियों के यश एवं वैश्यों के यश को प्राप्त करना चाहता हूँ। मैं यशों का भी यश हूँ। मैं दन्तरहित होने पर भी 'अदत्क' अर्थात् बिना दाँतों के ही भक्षण करने वाले लालवर्ण युक्त श्वेत बिन्दु (पिच्छिल स्त्री चिह्न) को प्राप्त न करूँ अर्थात् स्त्री गर्भ में गमन न करूँ॥ १ ॥

॥ पञ्चदशः खण्डः ॥

१९६ ॥ पञ्चदशः खण्डः ॥ तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्य आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषेणाभिसमावृत्य कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान्विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि संप्रतिष्ठाप्याहिँ सन्त्सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन्यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसंपद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते ॥ १ ॥ इस श्रेष्ठ आत्मज्ञान का वर्णन ब्रह्माजी ने प्रजापति से किया, प्रजापति ने मनु से तथा मनु ने समस्त प्रजा वर्ग को सुनाया। जो गुरु के प्रति अपने कर्त्तव्यों को नियमानुसार पूर्ण करके वेदों के ज्ञान को प्राप्त कर आचार्य के घर (गुरुकुल ) से विदा होकर अपने स्वजन सम्बन्धियों के साथ पवित्र स्थल में स्वाध्याय करता है। जो अपने पुत्रों व शिष्यों को धर्म पथ पर आरूढ़ कर समस्त इन्द्रियों को अपने अन्तःकरण में स्थिर कर लेता है तथा जो शास्त्रानुसार भूतों की हिंसा नहीं करता। वह निश्चित ही जीवन पर्यन्त श्रेष्ठ आचरण करता हुआ ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है, तत्पश्चात् वापस नहीं लौटता, वापस नहीं आता (आवागमन से मुक्त हो जाता है।) ॥ १ ॥ ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि.......इति शान्तिः ॥ ॥ इति छान्दोग्योपनिषत्समाप्ता ॥

(शीक्षा वल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली तथा भृगुवल्ली) हैं।

॥ तैत्तिरीयोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के तैत्तिरीय आरण्यक का एक भाग है। आरण्यक के १० अध्यायों में से क्रमशः सातवें, आठवें एवं नौवें अध्यायों को ही उपनिषदीय मान्यता मिली है। इसमें तीन वल्लियाँ (शीक्षा वल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली तथा भृगुवल्ली) हैं। शीक्षावल्ली के प्रारम्भ में अधिलोक, अधिज्यौतिष, अधिविद्या, अधिप्रज और अध्यात्म नामक पाँच महासंहिताओं का वर्णन है तथा उनकी फलश्रुति भी दी गयी है। साधना क्रम में ॐकार तथा भूः भुवः स्वः महः आदि व्याहृतियों के महत्त्व का उल्लेख है। अन्त में अध्ययन एवं अध्यापन करने के लिए सदाचार परक मर्यादा सूत्रों का उल्लेख करके विचार के साथ आचार की महत्ता का बोध कराया गया है। ब्रह्मानन्दवल्ली में हृदयगुहा में स्थित परमेश्वर को जानने का महत्त्व समझाते हुए उसके अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय कलेवरों का विवेचन है। आनन्द की मीमांसा में लौकिक आनन्द से लेकर उसके उत्तरोत्तर श्रेष्ठ स्वरूपों के वर्णन के साथ ब्रह्मानन्द तक की समीक्षा की गयी है। परमात्मा के आनन्द स्वरूप को समझने वालों की स्थिति का भी वर्णन है। भृगुवल्ली में भृगु की ब्रह्मपरक जिज्ञासा का समाधान उनके पिता वरुण ने किया है। तत्त्वज्ञान को समझाकर उन्हें तपश्चर्या द्वारा स्वयं अनुभव करने का निर्देश दिया गया है। उन्होंने क्रमशः अन्न, प्राण, मन, विज्ञान एवं आनन्द को ब्रह्म रूप में अनुभव किया। तब वरुण ने उन्हें अन्नादि का दुरुपयोग न करके उसके सुनियोजन का विज्ञान समझाया। अन्त में भगवद्भाव प्राप्त साधक की स्थिति तथा उसके समतायुक्त उद्गारों का उल्लेख है। ॥ शान्ति-पाठः ॥ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॥ अथ शीक्षावल्ली ॥ ॥ प्रथमोऽनुवाकः ॥ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥ मित्र देवता हमारे लिए कल्याणकारी हों। वरुणदेव हमारे लिए सुखप्रद हों। अर्यमादेव कल्याणकारी हों। इन्द्र तथा बृहस्पतिदेव सुखदायक हों। जिनके डग बहुत विशाल हैं, वे विष्णुदेव हमारे लिए शान्तिप्रद हों। ब्रह्म को नमस्कार है। हे वायो! आपको नमस्कार हो, क्योंकि आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। आपको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहते हैं। सत्य और ऋत भी आपको कहते हैं। वह (ब्रह्म) हमारी रक्षा करे। हमारे आचार्य की रक्षा करे। हमारी तथा हमारे आचार्य दोनों की रक्षा करे। त्रिविध तापों से सर्वत्र शान्ति ॥ १ ॥

१९८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ इस मन्त्र में वायु को प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा है, क्योंकि प्राण प्रवाह वायु के साथ संचरित होता है। ब्रह्म में सभी समाये हुए हैं और ब्रह्म सभी प्राणियों के जीवन रूप में संचरित है। इस सत्य के अनुरूप यह प्राणरूप-वायुमय परमात्म तत्त्व प्रत्यक्ष रूप में अनुभव गम्य है। सम्भवतः इसीलिए ऋषि ने वायु को प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा है। ] ॥ द्वितीयोऽनुवाकः ॥ ॐ शीक्षां व्याख्यास्यामः। वर्णः स्वरः। मात्रा बलम्। साम संतानः। इत्युक्तः शीक्षाध्यायः ॥ १ ॥ हम शिक्षा = (शीक्षा) की व्याख्या करते हैं। वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम तथा सन्धि - ये सब शिक्षा की सार वस्तुएँ हैं। इस प्रकार इसे शिक्षा अध्याय कहा गया है ॥ १ ॥ [ वर्ण = अ, आ, आदि, स्वर = उदात्त, अनुदात्त, स्वरित आदि वैदिक स्वर, मात्रा= ह्रस्व, दीर्घ आदि मात्रा, बल = वर्णोच्चारण में लगने वाली प्राणशक्ति, साम=मध्यम वृत्ति से उच्चारण करने की विधि तथा सन्तान=शब्दों की मिलन प्रक्रिया ( सन्धि ) है। शिक्षा का शीक्षा रूप वैदिक प्रयोग है। ] ॥ तृतीयोऽनुवाकः ॥ सह नौ यशः। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्। अथातः सꣳहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः ॥ पञ्चस्वधिकरणेषु। अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम्। ता महासꣳहिता इत्याचक्षते। अथाधिलोकम्। पृथिवी पूर्वरूपम्। द्यौरुत्तररूपम्। आकाशः संधिः ॥ १ ॥ वायुःसंधानम्। इत्यधिलोकम्। अथाधिज्यौतिषम्। अग्निः पूर्वरूपम्। आदित्य उत्तररूपम्। आपः संधिः। वैद्युतः संधानम्। इत्यधिज्यौतिषम्। अथाधिविद्यम्। आचार्यः पूर्वरूपम् ॥२ ॥ अन्तेवास्युत्तररूपम्। विद्या संधिः। प्रवचनꣳ संधानम्। इत्यधिविद्यम्। अथाधिप्रजम्। माता पूर्वरूपम्। पितोत्तररूपम्। प्रजा संधिः। प्रजननꣳ संधानम्। इत्यधिप्रजम्॥ ३ ॥ हम दोनों (शिष्य और आचार्य) का यश साथ-साथ बढ़े, हम दोनों का ब्रह्मतेज भी साथ-साथ बढ़े। अब हम पाँच अधिकरणों में संहिता की-उपनिषद् की व्याख्या करते हैं। ये पाँच अधिकरण - अधिलोक, अधिज्योतिष, अधिविद्य, अधिप्रज और अध्यात्म हैं। विद्वज्जन उन्हें महासंहिता कहते हैं। अब लोक सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। इसका पूर्वरूप पृथ्वि है। उत्तररूप द्युलोक है। पृथिवी और द्यु के बीच का अन्तरिक्ष इसका संधि रूप है। वायु संधान (संयोजक) रूप है। यह लोक संबन्धी संहिता है। अब ज्योति सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। (पृथ्वी स्थित) अग्नि पूर्व रूप है। (द्युलोक स्थित) आदित्य

  • सूर्य उत्तर रूप है, जल इन दोनों का संधि रूप है। (अन्तरिक्ष स्थित) विद्युत् इस संधि स्थान में संयोजक है। यह ज्योति सम्बन्धी संहिता है। अब विद्या सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। गुरु इसका पूर्व रूप है। शिष्य उत्तररूप है और विद्या संधि रूप है। प्रवचन संधि में संयोजक है। यह विद्या सम्बन्धी संहिता है। अब संतति (प्रजा) सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। माता पूर्व रूप है। पिता उत्तर रूप है। सन्तान संधि रूप है। प्रजनन कर्म संयोजक है। यह संतति सम्बन्धी संहिता है ॥ १-३ ॥ अथाध्यात्मम्। अधरा हनुः पूर्वरूपम्। उत्तरा हनुरुत्तररूपम्। वाक् संधिः। जिह्वा संधानम्। इत्यध्यात्मम्। इतीमा महासꣳहिताः। य एवमेता महासꣳहिता व्याख्याता वेद। संधीयते प्रजया पशुभिः। ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन सुवर्गेण लोकेन ॥ ४॥

शीक्षावल्ली अनुवाक ४ मन्त्र ३ १९९

शीक्षावल्ली अनुवाक ४ मन्त्र ३ १९९ अब आत्मा (शरीर) सम्बन्धी संहिता का वर्णन करते हैं। नीचे का जबड़ा पूर्व रूप है। ऊपर का जबड़ा उत्तर रूप है। वाणी सन्धि रूप है। जिह्वा इसमें संयोजक है। यह आत्मा सम्बन्धी संहिता है। इस प्रकार ये पाँच संहिताएँ कही गयी हैं। जो पुरुष इन महासंहिताओं के सार तत्त्व को जान लेता है, वह प्रजा, पशु, ब्रह्मवर्चस, अन्नादि भोग्य पदार्थ और स्वर्ग लोक आदि से सम्पन्न हो जाता है॥४॥ [ सामान्य रूप से संहिता, वर्णों के संयोजित समूह को कहते हैं। आचरण सूत्रों के संयोजित समूह को आचरण संहिता कहते हैं। इसी प्रकार जब विराट् इकाइयों लोक, ज्योति आदि के संयोजित समूहों का उल्लेख होता है, तो उन्हें 'महासंहिता' कहते हैं। वर्णों की संधि के चार भाग होते हैं :- पूर्व (पहले वाला), पर या उत्तर (बाद वाला), संधि (दोनों का संयुक्त रूप) तथा संधान (संयोजक नियम)। महासंधियों के वर्णन में भी ऋषि ने इन चारों भागों का उल्लेख किया है।] ॥ चतुर्थोऽनुवाकः॥ यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः। छन्दोभ्योऽध्यमृतात्संबभूव। स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु। अमृतस्य देव धारणो भूयासम्। शरीरं मे विचर्षणम्। जिह्वा मे मधुमत्तमा। कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम्। ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः। श्रुतं मे गोपाय ॥ १ ॥ जो वेदों में सर्वश्रेष्ठ हैं, सर्वरूप हैं। जिनका वेदों से विशेष रूप से प्राकट्य हुआ है, वे इन्द्रदेव (परमेश्वर) मुझे मेधा सम्पन्न बनाएँ। हे देव! मैं अमृत स्वरूप परमात्मा को धारण करने वाला बनूँ। मेरा शरीर स्फूर्तियुक्त हो। मेरी जिह्वा मधुर-भाषिणी हो। मेरे कान शुभ श्रवण करने वाले हों। आप मेधा से युक्त ब्रह्म की निधि के समान हैं। मेरे द्वारा सुनी गयी वाणियाँ विस्मृत न हों (रक्षित हों) ॥ १ ॥ आवहन्ती वितन्वाना। कुर्वाणाचीरमात्मनः। वासांसि मम गावश्च। अन्नपाने च सर्वदा। ततो मे श्रियमावह। लोमशां पशुभिः सह स्वाहा। आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। विमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ॥ २ ॥ हे देव! हमारे निमित्त उस श्री-सम्पदा को ले आएँ, जो तत्काल ही विविध वस्त्र, गौएँ, अन्नादि पदार्थ प्रदान करने वाली हो तथा रोमयुक्त पशुओं के साथ वैभव की वृद्धि करती हो। यह आहुति इसी निमित्त समर्पित है। ब्रह्मचारीगण हमारे पास आएँ। वे कपट रहित हों, वे प्रामाणिक ज्ञान को धारण करने वाले हों। वे इन्द्रियों का दमन करने वाले हों। वे मन का निग्रह करने वाले हों, इन सबके निमित्त आहुतियाँ समर्पित की जाती हैं॥ २ ॥ यशो जनेऽ सानि स्वाहा। श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा। तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा। स मा भग प्रविश स्वाहा। तस्मिन् सहस्रशाखे। निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा। यथापः प्रवता यन्ति। यथा मासा अहर्जरम्। एवं मां ब्रह्मचारिणः। धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा। प्रतिवेशोऽसि प्र मा भाहि प्र मा पद्यस्व ॥ ३॥ हम सब लोगों में यशस्वी हों। धनवानों में अधिक धनसम्पन्न हों। हे भगवन्! हम आपमें प्रविष्ट हों, आप हममें प्रविष्ट हों, हे सहस्र रूप वाले भगवन्! आपकी उपासना से हम पवित्र हों। इन सबके निमित्त आहुतियाँ समर्पित की जाती हैं। जैसे जल निम्न स्थानों की ओर प्रवाहित होते हुए समुद्र में पहुँच जाता है और माह, दिनों का क्षय करते हुए संवत्सर में विलीन हो जाते हैं। हे विधातः! उसी प्रकार ब्रह्मचारीगण सब ओर से हमारे पास आएँ, आप हमारे आश्रयस्थल हैं। आप हमें प्रकाशित करें। आप हमें प्राप्त हों ॥ ३ ॥

२०० तैत्तिरीयोपनिषद ॥ पञ्चमोऽनुवाकः ॥ भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः । तासामुह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः प्रवेदयते। मह इति । तद्ब्रह्म। स आत्मा। अङ्गान्यन्या देवताः। भूरिति वा अयं लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षम्। सुवरित्यसौ लोकः ॥ १॥ मह इत्यादित्यः। आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते। भूरिति वा अग्निः। भुव इति वायुः। सुवरित्यादित्यः। मह इति चन्द्रमाः। चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतीꣳषि महीयन्ते। भूरिति वा ऋचः। भुव इति सामानि। सुवरिति यजूंषि॥ २॥ मह इति ब्रह्म। ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते। भूरिति वै प्राणः। भुव इत्यपानः। सुवरिति व्यानः। मह इत्यन्नम्। अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते। ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा । चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः। ता यो वेद। स वेद ब्रह्म। सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ॥ ३ ॥ भूः, भुवः, स्वः - ये तीन व्याहृतियाँ हैं। उनसे भिन्न जो चौथी व्याहृति महः है, जिसे सर्वप्रथम महाचमस के पुत्र ने जाना था। वह महः ही ब्रह्म है। वही ब्रह्म की आत्मा है। अन्य देवता उसके अंग हैं। भूः - यह व्याहृति पृथिवी लोक है। भुवः - यह व्याहृति अन्तरिक्ष लोक है। स्वः - यह व्याहृति स्वर्गलोक है। महः - आदित्य है। उस आदित्य से ही सम्पूर्ण लोक महिमा को प्राप्त होते हैं। भूः - यह व्याहृति ही अग्नि है। भुवः- यह व्याहृति वायु है। स्वः- यह व्याहृति आदित्य है। महः - यह व्याहृति चन्द्रमा है। चन्द्रमा से ही समस्त ज्योतियाँ महिमा को प्राप्त होती हैं। भूः - यह ऋग्वेद है। भुवः - यह सामवेद है। स्वः- यह यजुर्वेद है। महः- यह ब्रह्म है। ब्रह्म से ही समस्त वेद महिमा को प्राप्त होते हैं। भूः

  • यह प्राण है। भुवः- यह अपान है। स्वः- यह व्यान है। महः- यह अन्न है। अन्न से ही सभी प्राणों में बल संचार होता है। ये चारों व्याहृतियाँ चार प्रकार की हैं। एक-एक के चार-चार भेद होने से कुल सोलह व्याहृतियाँ होती हैं। इस प्रकार जो जानता है, वह ब्रह्म को जान लेता है। उस पुरुष के लिए सम्पूर्ण देवता अपने अनुदान प्रदान करते हैं॥ १-३॥ ॥ षष्ठोऽनुवाकः ॥ स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः। तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः। अमृतो हिरण्मयः। अन्तरेण तालुके । य एष स्तन इवावलम्बते। सेन्द्रयोनिः । यत्रासौ केशान्तो विवर्तते। व्यपोह्य शीर्षकपाले। भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति । भुव इति वायौ ॥ १ ॥ सुवरित्यादित्ये। मह इति ब्रह्मणि । आप्नोति स्वाराज्यम् । आप्नोति मनसस्पतिम् । वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः । श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः। एतत्ततो भवति। आकाशशरीरं ब्रह्म। सत्यात्म प्राणारामं मन आनन्दम् । शान्तिसमृद्धममृतम् । इति प्राचीनयोग्योपास्व ॥ २ ॥ इस हृदयस्थ आकाश भाग में, वह मनोमय अमृत स्वरूप, प्रकाश स्वरूप परम पुरुष प्रतिष्ठित है। दोनों तालुओं के बीच जो यह स्तन के समान लटक रहा है, (उसके ऊपर) जहाँ केशों का मूल भाग है। शीर्ष कपाल को भेदकर सुषुम्ना नाड़ी जाती है, वह (सहस्रार या ब्रह्मरंध्र) इन्द्र योनि है। निर्वाण काल में साधक भूः स्वरूप अग्नि में प्रतिष्ठित होता है। भुवः स्वरूप वायु में प्रतिष्ठित होता है। स्वः स्वरूप आदित्य

शीक्षावल्ली अनुवाक ९ मन्त्र १ २०१

शीक्षावल्ली अनुवाक ९ मन्त्र १ २०१ में तथा महः स्वरूप ब्रह्म में अधिष्ठित होता है। (ब्रह्मवेत्ता साधक) अपने राज्य में अधिष्ठित होता है, वह सम्पूर्ण मन का स्वामी, वाणी, नेत्रों, कर्णों और विज्ञान का स्वामी हो जाता है। पूर्वोक्त साधन का यह फल मिलता है। वह ब्रह्म आकाश के सदृश विशाल है। वह सत्यरूप आत्म तत्त्व है, वह प्राणों को विश्राम देने वाला, मन को आनन्द देने वाला, शान्त और अमृत स्वरूप है। वही सर्वथा पुरातन पुरुष उपासना के योग्य है॥ १-२॥ [ इन्द्र शासक-संगठक के प्रतीक हैं। मनुष्य शरीर में स्थित देवता स्वरूप प्राण धाराओं को नियमित करने की सामर्थ्य सहस्रार एवं ब्रह्मरन्ध्र में सन्निहित होने से उसे इन्द्र योनि कहा गया है।] ॥ सप्तमोऽनुवाकः ॥ इस अनुवाक में ऋषि ने पाँच-पाँच तत्त्वों की विभिन्न पंक्तियों-शृंखलाओं का उल्लेख किया है और उन्हें एक दूसरे का पूरक कहा है- पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशाः। अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि। आप ओषधयो वनस्पतय आकाश आत्मा। इत्यधिभूतम्। अथाध्यात्मम्। प्राणो व्यानोऽपान उदानः समानः। चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् । चर्म मांसः स्नावास्थिमज्जा। एतदधि- विधाय ऋषिरवोचत्। पाङ्क्तं वा इदं सर्वम्। पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तः स्पृणोतीति॥ १॥ पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, दिशाएँ तथा अवान्तर दिशाएँ (दिशाओं के बीच के कोण) यह लोकों की पंक्ति है। अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा तथा समस्त नक्षत्र (यह ज्योति श्रृंखला में है)। जल, ओषधियाँ, वनस्पतियाँ, आकाश तथा आत्मा (यह काया से सम्बद्ध है), यह आधिभौतिक वर्णन हुआ। अब आध्यात्मिक वर्णन करते हैं- प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान (यह प्राण समूह है)। चक्षु, श्रोत्र, मन, वाणी तथा त्वचा (यह करणों-इन्द्रियों की पंक्ति है)। चर्म, मांस, नाड़ी, हड्डी और मज्जा (यह शरीर के धातु समूह में है)। यह परिपूर्ण कल्पना करते हुए ऋषि ने कहा है- यह सब पंक्तियों का समूह है। पंक्तियों से ही पंक्तियों की पूर्ति होती है॥ १॥ ॥ अष्टमोऽनुवाकः ॥ ओमिति ब्रह्म। ओमितीदःसर्वम्। ओमित्येतदनुकृतिर्हस्म वा अप्यो श्रावयेत्या- श्रावयन्ति। ओमिति सामानि गायन्ति। ओऽशोमिति शस्त्राणि शःसन्ति। ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति। ओमिति ब्रह्मा प्रसौति। ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति। ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति। ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १ ॥ ॐ ही ब्रह्म है। ॐ ही यह प्रत्यक्ष जगत् है। ॐ ही इसकी (जगत् की) अनुकृति है। हे आचार्य! ॐ के विषय में और भी सुनाएँ। आचार्य सुनाते हैं। ॐ से प्रारम्भ करके सामगायक सामगान करते हैं। ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मन्त्र पढ़े जाते हैं। ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मन्त्रों का उच्चारण करता है। ॐ कहकर अग्निहोत्र आरम्भ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ब्रह्म को प्राप्त करने की बात कहता है। ॐ के द्वारा वह ब्रह्म को प्राप्त करता है॥ १॥ ॥ नवमोऽनुवाकः ॥ ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने