भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 505 में से

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१९० छान्दोग्योपनिषद् प्रजापति ने कहा- आँख के अन्दर पुरुष के रूप में जो दृष्टिगोचर होता है, यही आत्मा है और यही अभय एवं ब्रह्मरूप है। उन्होंने प्रतिच्छाया को ही आत्मा समझकर प्रश्न किया कि - हे भगवन्! यह जो जल एवं दर्पण में सब ओर दृष्टिगोचर होता है, उसके अन्तर्गत आत्मा कौन सा है ? तब प्रजापति ने बताया- हमने चक्षुओं के अन्दर जो द्रष्टा कहा है, वही इन सभी में दिखाई पड़ता है ॥ ४ ॥ ॥ अष्टमः खण्डः ॥ उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानीथस्तन्मे प्रब्रूतमिति तौ होदशरावेऽ- वेक्षांचक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथेति तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आलोमभ्य आनखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ १ ॥ प्रजापति ने उन दोनों से कहा कि जल से परिपूर्ण पात्र में स्वयं अपने को देखकर तुम आत्मा के सन्दर्भ में जो भी कुछ न जान सको, वह मुझसे कहो। इस प्रकार उन दोनों ने जल से पूर्ण पात्र में दृष्टिपात किया। उन दोनों से प्रजापति ने कहा- तुम क्या देखते हो ? तब उन्होंने कहा- भगवन्! हम अपने शरीर के रोम (केश) से लेकर नख पर्यन्त प्रतिबिम्ब रूप में इस आत्मा को देखते हैं ॥ १ ॥ तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामिति तौ ह साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षांचक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति ॥ २ ॥ प्रजापति ने उन दोनों से कहा- तुम सुन्दर आभूषण एवं वस्त्रों से समलंकृत होकर तथा सम्पूर्ण शरीर को परिष्कृत करने के पश्चात् जल के अन्दर देखो। उन दोनों ने प्रजापति के कथनानुसार ही समस्त अलंकरणों एवं शुभ्र वस्त्रों को धारण कर और परिष्कृत होकर जल पात्र में देखा। तभी प्रजापति ने पुनः प्रश्न किया कि तुम दोनों क्या देख रहे हो ? ॥ २ ॥ तौ होचतुर्यथैवेदमावां भगवः साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ स्व एवमेवेमौ भगवः साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतावित्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तौ ह शान्तहृदयौ प्रवव्रजतुः ॥ ३ ॥ उन दोनों (इन्द्र और विरोचन) ने प्रजापति से कहा- हे भगवन् ! जिस तरह हम दोनों उत्तम अलकारों एवं शुभ्र परिधानों से युक्त एवं परिष्कृत हैं, वैसे ही ये दोनों जल के मध्य में दिखाई पड़ने वाले प्रतिबिम्ब भी उत्तम आभूषणों एवं शुभ्र वस्त्रों से युक्त एवं परिष्कृत हैं। तदनन्तर प्रजापति ने कहा- यही आत्मा है, यही अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है। तत्पश्चात् वे दोनों शान्त चित्त होकर चले गये ॥ ३ ॥ [ वे दोनों प्रजापति के कथन के मर्म को समझ न सके तथा विम्ब में दृश्यमान स्थूल काया को ही आत्मा के रूप में समझकर लौट पड़े। प्रजापति उनके अज्ञान को समझ गये।] तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचानुपलभ्यात्मानमनुविद्य व्रजतो यतर एतदुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वासुरा वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्तहृदय एव विरोचनोऽसुराञ्जगाम तेभ्यो हैतामुपनिषदं प्रोवाचात्मैवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महयन्नात्मानं परिचरन्नुभौ लोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ॥ ४ ॥ प्रजापति ने उन दोनों को (दूर जाता हुआ) देखकर कहा- ये दोनों (इन्द्र एवं विरोचन) आत्मा को

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