१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 189, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ८ खण्ड ७ मन्त्र ४ १८९ में से एक नाड़ी 'सुषुम्ना' मूर्धा (मस्तिष्क) की ओर निकल गई है। उस (सुषुम्ना) के द्वारा ऊर्ध्व की ओर गमन करने वाला जीव अमृतत्व को प्राप्त होता है। शेष अन्य यत्र-तत्र गमन करने वाली नाड़ियाँ केवल उत्क्रमण अर्थात् बाहर निकलने की हेतुभूता, (सुषुम्ना के अतिरिक्त उन सभी नाड़ियों से ऊर्ध्व लोकों की प्राप्ति नहीं होती है) ॥ ६॥ ॥ सप्तमः खण्डः ॥ य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ॥ १॥ (अब आत्मा के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए इन्द्र और विरोचन की आख्यायिका का वर्णन करते हैं। प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा-) जो आत्मा पापशून्य, जरारहित, मृत्यु से रहित, विशोक (शोक रहित), क्षुधारहित, पिपासारहित, सत्यकाम और सत्य संकल्प से युक्त है, उसे खोजना चाहिए, विशेष रूप से जानने का प्रयास करना चाहिए। जो उस आत्मा की अनुभूति प्राप्त करता है, वह सभी लोकों तथा समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है ॥ १॥ तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामानितीन्द्रो हैव देवानामभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणां तौ हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापतिसकाशमाजग्मतुः ॥ २॥ (प्रजापति ब्रह्मा जी के इस व्याख्यान को) देव और असुर दोनों ने (कर्ण परम्परा से) जाना। उन्होंने कहा कि उस आत्मा की जिज्ञासा करनी चाहिए। जिसके जानने से सभी लोकों और भोगों को प्राप्त किया जाता है। ऐसा सोचकर देवों के राजा इन्द्र और दैत्यों के राजा विरोचन दोनों आपस में सद्भाव न रखते हुए, (भी) हाथों में समिधाएँ लेकर (समित्पाणि होकर) प्रजापति के पास पहुँचे ॥ २॥ तौ ह द्वात्रिंशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्ता-ववास्तमिति । तौ होचतुर्य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति भगवतो वचो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ॥ वे दोनों ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए प्रजापति के पास ३२ वर्ष तक रहे। तत्पश्चात् प्रजापति ने उनसे कहा- आप सभी ने किस उद्देश्य विशेष की पूर्ति हेतु यहाँ वासस्थल बनाया है। उन दोनों ने कहा- जो आत्मा पापरहित, जरारहित, मृत्युरहित, शोक रहित, क्षुधा रहित, तृषारहित, सत्यकाम तथा सत्य संकल्प से युक्त है, वही जानने एवं अनुभव करने योग्य है, जो उस आत्मा को जानता एवं अनुभव करता है, वह समस्त लोकों और भोगों को प्राप्त करता है। आपके इस तरह के उपदेश को सभी श्रेष्ठ लोग कहते हैं। हम सभी (देव एवं असुरगणों) ने उसी श्रेष्ठ आत्मा को जानने के लिए यहाँ वास किया है ॥ ३ ॥ तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतम- भयमेतद्ब्रह्मेत्यथ योऽयं भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादर्शे कतम एष इत्येष उ एवैषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायत इति होवाच ॥ ४॥