भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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३० अमृतनादोपनिषद् [ आँख-कान आदि प्राण के संयोग से ही देखते-सुनते हैं। जब प्राण-प्रणव की ओर लग जाते हैं, तो इन्द्रियों से प्रकाश पूर्ण ध्वनि तरंगें टकराती भर हैं। उनका बोध करने वाला ( प्राण ) वहाँ न होने से अंधे-बहरे जैसी ही स्थिति हो जाती है।] मनःसंकल्पकं ध्यात्वा संक्षिप्यात्मनि बुद्धिमान्। धारयित्वा तथात्मानं धारणा परिकीर्तिता ॥ १६ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य मन को संकल्प के रूप में जानकर, उसे आत्मा (बुद्धि) में लय कर दे। तत्पश्चात् उस आत्मारूपी सद्बुद्धि को भी परमात्म सत्ता के ध्यान में स्थिर कर दे। इस तरह की क्रिया को ही 'धारणा की स्थिति' के रूप में जाना जाता है ॥ १६ ॥ आगमस्याविरोधेन ऊहनं तर्क उच्यते। समं मन्येत यल्लब्ध्वा स समाधिः प्रकीर्तितः ॥ १७॥ शास्त्रानुकूल 'ऊहा' अर्थात् विचार करना 'तर्क' कहा जाता है। ऐसे 'तर्क' को प्राप्त करके दूसरे अन्य सभी प्राप्त होने वाले पदार्थों को तुच्छ (निकृष्ट) मान लिया जाता है। इस प्रकार की स्थिति को ही 'समाधि' की अवस्था कहा जाता है ॥ १७ ॥ [ भौतिक पदार्थ वरेण्य नहीं-इष्ट ही वरेण्य है, यह तर्क अन्तःकरण में बैठते ही प्राणों को इष्ट में समाहित कर देता है।] भूमौ दर्भासने रम्ये सर्वदोषविवर्जिते। कृत्वा मनोमयीं रक्षां जप्त्वा वै रथमण्डले ॥ १८ ॥ भूमि को स्वच्छ, समतल करके रमणीय तथा (अशुद्ध, विषय एवं कीट आदि) सभी दोषों से रहित क्षेत्र में मानसिक रक्षा (दिग्बन्धादि) करता हुआ रथ मण्डल ( ॐकार) का जप करे ॥ १८ ॥ पद्मकं स्वस्तिकं वापि भद्रासनमथापि वा। बद्ध्वा योगासनं सम्यगुत्तराभिमुखः स्थितः ॥ १९॥ पद्मासन, स्वस्तिकासन और भद्रासन में से किसी एक योगासन में आसीन होकर उत्तराभिमुख हो करके बैठना चाहिए ॥ १९ ॥ नासिकापुटमङ्गुल्या पिधायैकेन मारुतम्। आकृष्य धारयेदग्निं शब्दमेव विचिन्तयेत् ॥ २० ॥ तत्पश्चात् नासिका के एक छिद्र (दायें) को एक अँगुली से बन्द करके, दूसरे खुले छिद्र (बायें) से वायु को खींचे। फिर दोनों नासापुटों को बन्द करके उस प्राण वायु को धारण करे। उस समय तेजःस्वरूप शब्द (ओंकार) का ही चिन्तन करे ॥ २० ॥ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ओमित्येतन्न रेचयेत्। दिव्यमन्त्रेण बहुधा कुर्यादामलमुक्तये ॥ २१ ॥ वह शब्द रूप एकाक्षर प्रणव ( ॐ ) ही ब्रह्म है। तदनन्तर इसी एकाक्षर ब्रह्म ॐकार का ही ध्यान करता हुआ रेचक क्रिया सम्पन्न करे अर्थात् वायु का शनैः-शनैः निष्कासन करे। इस तरह से कई बार इस 'ओंकार' रूपी दिव्य मन्त्र से (प्राणायाम की क्रिया द्वारा) अपने चित्त के प्रमादादि मल (विकारों) को दूर करना चाहिए। २१॥