भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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मन्त्र २७ ३१ पश्चाद्ध्यायीत पूर्वोक्तक्रमशो मन्त्रविद्बुधः । स्थूलादिस्थूलसूक्ष्मं च नाभेरूर्ध्वमुपक्रमः ॥ २२॥ इस प्रकार प्राणायाम के द्वारा सभी दोषों का शमन करते हुए पूर्व निर्दिष्ट क्रम (अकार, उकार, मकार) के अनुसार 'ओंकार' का ध्यान करते हुए प्राणायाम करे। इस तरह का 'प्रणव गर्भ' प्राणायाम नाभि के ऊर्ध्व भाग अर्थात् हृदय में (विराट् आदि का) ध्यान करते हुए स्थूलातिस्थूल मात्रा में सम्पन्न करे ॥ २२ ॥ [ प्राणायाम की अस्सी आवृत्ति-स्थूल मात्रा तथा एक श्वास में अस्सी प्रणव मन्त्र का जप-अति स्थूल मात्रा कहलाती है।] तिर्यगूर्ध्वमधोदृष्टिं विहाय च महामतिः । स्थिरस्थायी विनिष्कंपः सदा योगं समभ्यसेत् ॥ २३ ॥ अपनी दृष्टि को ऊपर अथवा नीचे की ओर तिरछा घुमाकर केन्द्रित करते हुए बुद्धिमान् साधक स्थिरता पूर्वक निष्कम्प भाव से स्थित होकर योग का अभ्यास करे ॥ २३ ॥ तालमात्राविनिष्कम्पो धारणायाजनं तथा। द्वादशमात्रो योगस्तु कालतो नियमः स्मृतः ॥ २४ ॥ योगाभ्यास की यह क्रिया तालवृक्ष की भाँति कुछ ही काल में फल प्रदान करने वाली है। इसका अभ्यास पहले से सुनिश्चित योजनानुसार ही करने योग्य है अर्थात् बीच में उसे घटाना, बढ़ाना या रोकना नहीं चाहिए। द्वादश मात्राओं की आवृत्ति भी समान समय में ही पूर्ण करनी चाहिए ॥ २४ ॥ अघोषमव्यञ्जनमस्वरं च अतालुकण्ठोष्ठमनासिकं च यत् । अरेफजातमूभयोष्ववर्जितं यदक्षरं न क्षरते कथंचित् ॥ २५ ॥ इस प्रणव नाम से प्रसिद्ध घोष का उच्चारण बाह्य प्रयत्नों से नहीं होता है। यह व्यञ्जन एवं स्वर भी नहीं है। इसका उच्चारण कण्ठ, तालु, ओष्ठ एवं नासिका आदि (सानुनासिक) से भी नहीं होता। इसका दोनों ओष्ठों के अन्तः में स्थित दन्त नामक क्षेत्र से भी उच्चारण नहीं होता। 'प्रणव' वह श्रेष्ठ अक्षर है, जो कभी भी च्युत नहीं होता। ओंकार का प्राणायाम के रूप में अभ्यास करना चाहिए तथा मन गुञ्जायमान घोष में सदैव लगाए रहना चाहिए ॥ २५ ॥ [ ॐकार को 'उद्गीथ' कहा गया है। इसे उद्-प्राणों के माध्यम से ही झंकृत किया जाता है।] येनासौ गच्छते मार्गं प्राणस्तेनाभिगच्छति । अतस्तमभ्यसेन्नित्यं यन्मार्गगमनाय वै ॥ २६ ॥ योगी पुरुष जिस मार्ग का अवलोकन करता है अर्थात् मन के माध्यम से जिस स्थान को प्रवेश करने योग्य मानता है, उसी मार्ग (द्वार) से प्राण और मन के साथ गमन कर जाता है। प्राण श्रेष्ठ मार्ग (द्वार) से गमन करे, इस हेतु साधक को नित्य- नियमित अभ्यास करते रहना चाहिए ॥ २६ ॥ हृद्द्वारं वायुद्वारं च मूर्धद्वारमथापरम् । मोक्षद्वारं बिलं चैव सुषिरं मण्डलं विदुः ॥ २७॥ वायु के प्रवेश का मार्ग हृदय ही है। इससे ही प्राण सुषुम्णा के मार्ग में प्रवेश करता है। इससे ऊपर ऊर्ध्वगमन करने पर सबसे ऊपर मोक्ष का द्वार ब्रह्मरन्ध्र है। योगी लोग इसे सूर्यमण्डल के रूप में जानते हैं। इसी सूर्यमण्डल अथवा ब्रह्मरन्ध्र का भेधन करके प्राण का परित्याग करने से मुक्ति प्राप्त होती है ॥ २७ ॥