भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 505 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 356

३५६ बृहदारण्यकोपनिषद् इसके पश्चात् शिशु की माता को 'इलासि' आदि मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित करे। कहे- हे देवि ! तुम स्तुत्य मैत्रावरुणी हो। तुमने वीर पुत्र को उत्पन्न किया है और हमें वीर बालक का पिता बनाया है, इसलिए तुम वीरवती होओ। इस शिशु को देखकर जन सामान्य कहे कि यह अपने पिता और पितामह से भी श्रेष्ठ हुआ है, यह लक्ष्मी, यश और ब्रह्मवर्चस को प्राप्त कर प्रगति की पराकाष्ठा पर पहुँच गया है। जिस ब्राह्मण के यहाँ इस प्रकार का विद्वान् पुत्र जन्म लेता है (वह भी इसी प्रकार स्तुति करने योग्य होता है) ॥ २८ ॥ ॥ पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥ अथ वंशः पौतिमाषीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात् कात्यायनीपुत्रो गौतमीपुत्राद्गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्राद्भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्र औपस्वस्तीपुत्रादौपस्वस्तीपुत्रः पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात्कात्यायनीपुत्रः कौशिकीपुत्रात्कौशिकीपुत्र आलम्बीपुत्राच्च वैयाघ्रपदीपुत्राच्च वैयाघ्रपदीपुत्रः काण्वीपुत्राच्च कापीपुत्राच्च कापीपुत्रः ॥ १ ॥ आत्रेयीपुत्रादात्रेयीपुत्रो गौतमीपुत्राद्गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्राद्भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्रो वात्सीपुत्राद्वात्सीपुत्रः पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्रो वार्कारुणीपुत्राद्वार्कारुणीपुत्रो वार्कारुणीपुत्राद्वार्कारुणीपुत्र आर्तभागीपुत्रादार्तभागीपुत्रः शौङ्गीपुत्राच्छौङ्गीपुत्रः सांकृतीपुत्रात्सांकृतीपुत्र आलम्बायनीपुत्रादालम्बायनीपुत्र आलम्बीपुत्रादालम्बीपुत्रो जायन्तीपुत्राज्जायन्तीपुत्रो माण्डूकायनीपुत्रान्माण्डूकायनीपुत्रो माण्डूकीपुत्रान्माण्डूकीपुत्रः शाण्डिलीपुत्राच्छाण्डिलीपुत्रो राथीतरीपुत्राद्राथीतरीपुत्रो भालुकीपुत्राद्भालुकीपुत्रः क्रौञ्चिकीपुत्राभ्यां क्रौञ्चिकीपुत्रौ वैदभृतीपुत्राद्वैदभृतीपुत्रः कार्शकेयीपुत्रात्कार्शकेयीपुत्रः प्राचीनयोगीपुत्रात्प्राचीनयोगीपुत्रः सांजीवीपुत्रा- त्सांजीवीपुत्रः प्राश्नीपुत्रादासुरिवासिनः प्राश्नीपुत्र आसुरायणादासुरयण आसुरेरासुरिः ॥२॥ याज्ञवल्क्याद्याज्ञवल्क्य उद्दालकादुद्दालकोऽरुणादरुण उपवेशेरुपवेशिः कुश्रेःकुश्रि- र्वाजश्रवसो वाजश्रवा जिह्वावतो बाध्योगाज्जिह्वावान्बाध्योगोऽसिताद्वार्षगणादसितो वार्ष- गणो हरितात्कश्यपाद्धरितः कश्यपः शिल्पात्कश्यपाच्छिल्पः कश्यपः कश्यपान्नैध्रुवेः कश्यपो नैध्रुविर्वाचो वागम्भिण्या अम्भिण्यादित्यादित्यानीमानि शुक्लानि यजूंषि वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येनाख्यायन्ते ॥ ३ ॥ अब (ब्रह्मवेत्ता ऋषियों की) वंशावली का वर्णन किया जाता है। पौतिमाषी पुत्र ने कात्यायनी सुत से, कात्यायनी सुत ने गौतमी पुत्र से, गौतमी पुत्र ने भारद्वाजी पुत्र से, भारद्वाजी पुत्र ने पाराशरी के पुत्र से, पाराशरी सुत ने औपस्वस्ती सुत से, औपस्वस्ती सुत ने पाराशरी पुत्र से, पाराशरी पुत्र ने कात्यायनी पुत्र से, कात्यायनी पुत्र ने कौशिकी के पुत्र से, कौशिकी के पुत्र ने आलम्बी तनय और वैयाघ्रपदी तनय से, वैयाघ्रपदी तनय ने काण्वी पुत्र तथा कापी पुत्र से शिक्षा प्राप्त की। कापी पुत्र ने आत्रेयी सुत से, आत्रेयी पुत्र ने गौतमी सुत से, गौतमी सुत ने भारद्वाजी पुत्र से, भारद्वाजी पुत्र ने पाराशरी पुत्र से, पाराशरी पुत्र ने वात्सी