भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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अध्याय ६ ब्राह्मण ५ मन्त्र ४ ३५७ के पुत्र से, वात्सी सुत ने पाराशरी सुत से, पाराशरी सुत ने वार्कारुणी पुत्र से, वार्कारुणी पुत्र ने आर्तभागी पुत्र से, आर्तभागी तनय ने शौङ्गी सुत से, शौङ्गी सुत ने सांकृती पुत्र से, सांकृती पुत्र ने आलम्बायनी के पुत्र से, आलम्बायनी पुत्र ने आलम्बी के पुत्र से, आलम्बी पुत्र ने जायन्ती के पुत्र से, जायन्ती पुत्र ने माण्डूकायनी पुत्र से, माण्डूकायनी तनय ने माण्डूकी तनय से, माण्डूकी तनय ने शाण्डिली पुत्र से, शाण्डिली पुत्र ने राथीतरी के पुत्र से, राथीतरी पुत्र ने भालुकी सुत से, भालुकी सुत ने दो क्रौञ्चिकी सुतों से, दोनों क्रौञ्चिकी सुतों ने वैद्धृती पुत्र से, वैद्धृती पुत्र ने कार्शकेयी पुत्र से, कार्शकेयी पुत्र ने प्राचीन योगी पुत्र से, प्राचीन योगी पुत्र ने साञ्जीवी पुत्र से, साञ्जीवी पुत्र ने आसुरिवासी प्राश्री पुत्र से, प्राश्रीपुत्र ने आसुरायण से, आसुरायण ने आसुरि से ज्ञान प्राप्त किया। आसुरि ने याज्ञवल्क्य से, याज्ञवल्क्य ने उद्दालक से, उद्दालक ने अरुण से, अरुण ने उपवेशि से, उपवेशि ने कुश्रि से , कुश्रि ने वाजश्रवा से, वाजश्रवा ने जिह्वावान् बाध्योग से, जिह्वावान् बाध्योग ने असित वार्षगण से, असित वार्षगण ने हरित कश्यप से, हरित कश्यप ने शिल्प कश्यप से, शिल्प कश्यप ने नैध्रुवि कश्यप से, नैध्रुविकश्यप ने वाक् से, वाक् ने अम्भिणी से, अम्भिणी ने आदित्य से शिक्षा प्राप्त की। आदित्य द्वारा प्रदत्त शुक्ल यजुर्वेद की श्रुतियाँ ही वाजसनेय याज्ञवल्क्य द्वारा प्रसारित की गई हैं॥ १-३॥ समानमा सांजीवीपुत्रात्सांजीवीपुत्रो माण्डूकायनेर्माण्डूकायनिर्माण्डव्यान्माण्डव्यः कौत्सात्कौत्सो माहित्थेर्माहित्थिर्रामकक्षायणाद्वामकक्षायणः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यो वात्स्याद्वात्स्यः कुश्रेः कुश्रिर्यज्ञवचसो राजस्तम्बायनाद्यज्ञवचा राजस्तम्बायनस्तुरा- त्कावषेयात्तुरः कावषेयः प्रजापतेः प्रजापतिर्ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नमः ॥ ४॥ साञ्जीवी पुत्र तक एक ही वंश है। (इसके पश्चात्) साञ्जीवी पुत्र ने माण्डूकायनि से, माण्डूकायनि ने माण्डव्य से, माण्डव्य ने कौत्स से, कौत्स ने माहित्थि से, माहित्थि ने वामकक्षायण से, वामकक्षायण ने शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने वात्स्य से, वात्स्य ने कुश्रि से, कुश्रि ने यज्ञवचा राजस्तम्बायन से, यज्ञवचा राजस्तम्बायन ने तुर कावषेय से, तुर कावषेय ने प्रजापति से, प्रजापति ने ब्रह्म से ज्ञान प्राप्त किया। ब्रह्म तो स्वयंभू है। उस स्वयंभू ब्रह्म को नमन है ॥ ४॥ ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ पूर्णमदःपूर्णमिदं .........इति शान्तिः ॥ ॥ इति बहदारण्यकोपनिषत्समाप्ता ॥