१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 364, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ मुण्डकापानषद् ॥ यह अथर्ववेद की शौनकीय शाखा की उपनिषद् है, जिसमें तीन मुण्डक हैं तथा प्रत्येक मुण्डक में दो-दो खण्ड हैं। 'मुण्डक' शब्द का तात्पर्यार्थ 'मन का मुण्डन कर अविद्या से मुक्त करने वाला ज्ञान' है। इसमें महर्षि अङ्गिरा ने शौनक जी को परा-अपरा विद्या समझायी है। प्रथम मुण्डक के प्रथम खण्ड में ब्रह्मविद्या की परम्परा के बाद ऋषि संवाद के रूप में परा-अपरा विद्या का विवेचन है एवं परा विद्या से ब्रह्मबोध तथा परमेश्वर से जगत् की उत्पत्ति का वर्णन है। दूसरे खण्ड में अपरा विद्या, यज्ञ और उसके फल, भोगों से विरक्ति तथा ब्रह्मबोध के लिए ब्रह्मनिष्ठ गुरु तथा अधिकारी शिष्य के सम्मिलन को आवश्यकता बतायी गयी है। द्वितीय मुण्डक में अग्नि की चिनगारियों की तरह ब्रह्म से जगत् की उत्पत्ति एवं लय का वर्णन करते हुए ॐकार रूपी धनुष एवं आत्मा रूपी बाण से परमात्मा का लक्ष्यवेध, ब्रह्म का स्वरूप एवं ब्रह्म प्राप्ति का महत्त्व है। तृतीय मुण्डक में शरीर रूपी एक ही वृक्ष पर जीवात्मा और परमात्मा रूपी दो पक्षियों के उदाहरण सहित अन्तःकरण की शुद्धि द्वारा ब्रह्म प्राप्ति तथा ब्रह्मवेत्ता की गति तथा महत्ता का वर्णन है। ॥ शान्ति पाठः ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम .......इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- प्रश्नोपनिषद्) ॥ अथ प्रथमं मुण्डकम् ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥ देव ब्रह्मा सभी देवों में प्रथम उत्पन्न हुए। वे विश्व का निर्माण करने वाले हैं और चौदह भुवनों के रक्षक हैं। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को समस्त विद्याओं की आधारभूता 'ब्रह्मविद्या' का उपदेश दिया ॥ अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् । स भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥ अथर्वा को देव ब्रह्मा ने जिस ब्रह्म विद्या का उपदेश दिया था, अथर्वा ने वह विद्या अङ्गिर (अंगी मुनि) को प्रदान की । अङ्गिर ने उसका उपदेश भरद्वाज पुत्र सत्यवाह को दिया। सत्यवाह ने वही विद्या अङ्गिरस् को प्रदान की ॥ २ ॥ शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ । कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३ ॥ प्रसिद्ध सद्गृहस्थ शौनक ने अङ्गिरस् के पास शिक्षार्थी के रूप में विधिवूर्वक जाकर पूछा- हे भगवन् ! किसके जान लेने पर यह सब कुछ जान लिया जाता है ॥ ३ ॥