१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमुण्डक १ खण्ड २ मन्त्र १ ३६५ तस्मै स होवाच। द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ अङ्गिरस् ऋषि ने शौनक को उत्तर दिया-ब्रह्मवेत्ताओं ने ब्रह्मविद्या के अन्तर्गत दो विद्याएँ जानने योग्य बतायी हैं- एक परा विद्या और दूसरी अपरा विद्या ॥ ४ ॥ तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति। अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥ जिसमें ऋग्, यजुष्, साम, अथर्व, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष् का ज्ञान होता है-वह अपरा विद्या है तथा जिसमें उस अक्षर 'ब्रह्म' (ॐकार) का ज्ञान होता है, वह परा विद्या है ॥ ५ ॥ यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादं नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ६ ॥ वह जो देखा न जा सके, न पकड़ा जा सके, जिसका कोई गोत्र नहीं, कोई वर्ण नहीं, जिसे चक्षु और श्रोत्र की आवश्यकता नहीं, जिसे हाथ और पैरों की आवश्यकता नहीं, जो सदैव नित्य, व्यापक, सर्वत्र व्याप्त और अत्यन्त सूक्ष्म है, जो क्षयरहित अथवा अनश्वर है, जो सम्पूर्ण भूतों का कारणभूत है, उस परब्रह्म को विवेकीजन सर्वत्र देखते हैं ॥ ६ ॥ यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति। यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाक्षरात्संभवतीह विश्वम् ॥ ७ ॥ मकड़ी जैसे अपने पेट से जाले को उत्पन्न करती और अपने भीतर ही निगल लेती है, पृथ्वी जैसे विभिन्न प्रकार की ओषधियाँ उत्पन्न करती है, मनुष्य शरीर से जैसे केश और लोम (रोयें) उत्पन्न होते हैं, वैसे ही उस अनश्वर ब्रह्म से ही यह विश्व उत्पन्न होता है ॥ ७ ॥ तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते । अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ ८ ॥ तप के द्वारा ब्रह्म बढ़ता है (बीज रूप को प्राप्त होता है)। उससे अन्न उत्पन्न होता है, अन्न से प्राण, उससे मन, उससे सत्य (पञ्चभूत), उससे लोक और मनुष्यादि, उनसे कर्म और कर्म से अमृतरूप फल प्राप्त होता है ॥ ८ ॥ यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥ ९ ॥ जो सर्वज्ञ और सर्वविद् है, उसका तप भी ज्ञान युक्त होता है। उसी परब्रह्म से इस ब्रह्माण्ड में नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होता है ॥ ९ ॥ [ परब्रह्म कायारहित है, इसलिए उसके द्वारा किया हुआ तप लौकिक प्रचलन के आधार पर नहीं समझा जा सकता। वह अविरल-शान्त, अगम स्थिति में संकल्प पूर्वक जो हलचल उत्पन्न करता है, वही उसका तप है।] ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा संततानि । तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १ ॥