भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 505 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 366

३६६ मुण्डकोपनिषद् सूक्ष्मदर्शी ज्ञानियों ने वेदमन्त्रों में जिन कर्मों का दर्शन किया, त्रेतायुग में उन्हीं का विविध प्रकार से विस्तार हुआ। हे सत्य की कामना से युक्त पुरुषो ! अपने कर्मों का श्रेष्ठ फल प्राप्त करने के लिए इस जगत् में यही मार्ग है कि आप सब नित्य ही श्रेष्ठ आचरण करें ॥ १ ॥ यदा लेलायते ह्यर्चिःसमिद्धे हव्यवाहने तदाज्यभागावन्तरेणाहुतीःप्रतिपादयेच्छ्रद्धया हुतम् ॥ २ ॥ देवताओं तक हव्य पहुँचाने वाले अग्नि के प्रदीप्त होने पर समिधाओं के बीच से जब ज्वालाएँ धधक उठें, उस समय आज्य भाग आहुतियों के बीच में श्रद्धापूर्वक क्रमशः आहुतियाँ प्रदान करें ॥ २ ॥ यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमासमचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च । अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान्हिनस्ति ॥ ३ ॥ जिसका अग्निहोत्र दर्श (अमावस्या)-पौर्णमास (पूर्णमासी) से रहित, चातुर्मास्य सम्बन्धी यज्ञ तथा आग्रयण (शरद् ऋतु में निर्दिष्ट यज्ञ) से रहित, अतिथि पूजन से रहित, यथा समय किये जाने वाले यज्ञ तथा बलिवैश्व से रहित एवं विधि रहित है, ऐसा अग्निहोत्री अपने सात जन्मों के पुण्य का विनाश करता है ॥ ३ ॥ काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा । स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ ४ ॥ काली, कराली (अत्यन्त तीक्ष्ण), मनोजवा (मन के समान चञ्चल), लाल वर्ण वाली, धूम्र वर्ण वाली, चिनगारी वाली तथा देदीप्यमान विश्वरुची ये अग्नि की सप्त जिह्वाएँ हैं ॥ ४ ॥ एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन् । तन्नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽ धिवासः ॥ ५ ॥ जो पुरुष इन देदीप्यमान अग्नि ज्वालाओं में यथासमय आहुतियाँ देता हुआ अग्निहोत्र कृत्य सम्पन्न करता है, उसे वे आहुतियाँ ही सूर्य रश्मियों के साथ देवाधिपति इन्द्रदेव के पास(स्वर्ग में) ले जाती हैं ॥ एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति। प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ६ ॥ वे आहुतियाँ यजमान का सत्कार करती हुई उसे सूर्यरश्मियों के साथ ले जाती हुई कहती हैं कि आओ-आओ, यह आपके शुभ कर्मों के पुण्य (फल) से प्राप्त हुआ ब्रह्मलोक है ॥ ६ ॥ प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म । एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति ॥ ७ ॥ ये यज्ञरूप अग्निहोत्रादि कर्म जिनमें अट्ठारह ऋत्विज् ( १६ ऋत्विज्, यजमान और यजमान पत्नी) कहे जाते हैं। सकाम कर्म के आदेश में आने से अस्थिर एवं नाशवान् बताये गये हैं। जो मूढ़ लोग 'यही श्रेय है' कहकर इनकी प्रशंसा करते हैं, वे बार-बार जरा-मरण को प्राप्त होते रहते हैं ॥ ७ ॥ अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः । जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ८ ॥ अविद्याग्रस्त रहते हुए भी अपने को बड़ा बुद्धिमान् तथा बड़ा पण्डित समझने वाले वे मूढ़ लोग अन्धे के नेतृत्व में चलने वाले अन्धों के समान भटकते और अनेक कष्ट सहन करते हैं ॥ ८ ॥