१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४३२ परिशिष्ट अनंत ६. अज्ञान — द्र० - अविद्या । ७. अणु- पदार्थ के अतिसूक्ष्म कण को अणु कहा गया है, यह पदार्थ का इन्द्रिय-अग्राह्य सूक्ष्मकण होता है, जो पदार्थ के मौलिक गुण को अपने में धारण किये रहता है। एक अणु, दो या अनेक परमाणुओं के संयोग से बनता है। अणु को विश्व प्रपंच का कारण मानने वाला सिद्धान्त अणुवाद कहलाया। वैशेषिक दर्शन का यह प्रमुख अङ्ग है। जैन मतानुसार अणु स्थूल या सूक्ष्म रूप में रह सकता है। जब यह सूक्ष्म रूप में रहता है, तो अगणित अणु एक स्थूल अणु को घेरे रहते है। अणु अपने अन्दर इतनी गति का विकास कर सकता है कि एक क्षण में वह विश्व के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँच सके। उपनिषद् में यह प्रतिपादन है कि आत्म तत्त्व के विषय में अन्य ज्ञानी पुरुष के उपदेश न करने पर मनुष्य का प्रवेश नहीं होता, क्योंकि वह अत्यन्त सूक्ष्म अणु से भी अधिक सूक्ष्म है; अतः तर्क से परे है- अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति अणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् (कठ० १.२.८)। वह आत्मतत्त्व सूक्ष्म से अतिसूक्ष्म और महान् से अति महान् है- अणोरणीयान्महतो महीयान् (कठ० १.२.२०)। ८. अथर्वा-अङ्गिरा - अथर्वा अथर्ववेद के द्रष्टा ऋषि हुए हैं। सम्भवतः इन्हीं के नाम से अथर्ववेद नाम एक वेद का पड़ा। ब्रह्माजी के प्रमुखतः दो पुत्र हुए हैं- एक अथर्वा, दूसरे अङ्गिरा। मुण्डकोपनिषद् के प्रथम श्लोक में देव ब्रह्मा के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में ये अभिप्रेत हैं। ब्रह्माजी ने सब विद्याओं में आधारभूत ब्रह्मविद्या का उपदेश सर्वप्रथम अथर्वा को किया। अथर्वा ने इस विद्या का उपदेश अङ्गिर ऋषि को किया- अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् (मुण्ड० १.१.२)। अथर्वा के गोत्रज अथर्वाणः या 'आथर्वणः' कहलाये और अङ्गिरा के गोत्रज 'आङ्गिरस' कहलाये। महाभारत में अथर्वा का उल्लेख अथर्वन् के रूप में मिलता है, जिन्होंने समुद्र में छिपे हुए अग्नि का पता लगाया था (महा०वनपर्व २२२)। अङ्गिरा का उल्लेख अङ्गिरस् नाम से ब्रह्मादेव के छः मानस पुत्रों में से एक पुत्र के रूप में मिलता है (महा० आदिपर्व ६५.१०)। अथर्वा और अङ्गिरा का संयुक्त रूप से उल्लेख कई स्थानों पर मिलता है। अथर्ववेद के मन्त्र अथर्वा और अङ्गिरा द्वारा दृष्ट होने के कारण उन्हें 'अथर्वाङ्गिरसः' कहकर निरूपित किया गया है- तस्य यजुरेव शिरः। अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा (तैत्ति०२.३.१)। ९. अद्वैत - वेदान्त दर्शन का प्रमुख सिद्धांत 'अद्वैत' है। आद्य शंकराचार्य ने इसी सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। इसलिए यह उनके सिद्धांत का पर्याय बन गया है। शंकराचार्य ने एकमात्र सत्ता 'परब्रह्म' को स्वीकार की है। उनके अनुसार पारमार्थिकी (भूत-वर्तमान-भविष्यत्) सत्ता 'परब्रह्म' की है। वही नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव वाला निर्गुण, अविकारी, कूटस्थ है, उसके अतिरिक्त और कोई तत्त्व नहीं है। एकमेवाद्वितीयम् ब्रह्म (त्रि०म०३.३, पैंग० १.१), एकमेव परं ब्रह्म विभाति (ब्रह्म० २), एकमेवाद्वितीयम् (छान्दो० ६.२.१) जैसे श्रुति वचन इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। सांख्य दर्शन प्रकृति और पुरुष दो तत्त्व स्वीकार करता है, इसलिए उसे 'द्वैत' दर्शन कहते हैं। कोई-कोई ईश्वर, जीव, प्रकृति तीन तत्त्व स्वीकार करते हैं, वे त्रैत दर्शन कहलाते हैं। शंकराचार्य ने एक तत्त्व को ही स्वीकार किया-न द्वैतः इति अद्वैतः, जहाँ दो तत्त्व नहीं हैं, वह अद्वैत है। शंकराचार्य जी का कहना है कि वही शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव वाला एक परमतत्त्व-परब्रह्म, माया विशिष्ट होकर सगुण ब्रह्म-अपरब्रह्म बन जाता है और जगत् का निमित्त एवं उपादान कारण बनता है। दूसरे शब्दों में 'ब्रह्म' तो एक ही है, परन्तु माया की उपाधि से कारण ब्रह्म और कार्य ब्रह्म-दो हो जाता है। कार्य ब्रह्म की केवल प्रातिभासिक एवं व्यावहारिक सत्ता है, पारमार्थिक सत्ता केवल कारण ब्रह्म को है। इसी एक तत्त्व को प्रधानता के आधार पर यह सिद्धांत 'अद्वैत' कहलाता है। १०. अधिष्ठान - अधिष्ठान शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं- वासस्थान, रहने का स्थान, स्थिति, मुकाम, आधार, अधिकार आदि। अधिष्ठान से सम्बद्ध अधिष्ठाता शब्द बना है, जिसका अर्थ है- अधिकारी, अध्यक्ष, मुखिया, नियन्ता, देखभाल करने वाला। अधिष्ठान शब्द की व्युत्पत्ति अधि+स्था-अधिकरणे ल्युट् की गयी है। इसके पर्याय हलायुधकोश में नगर, चक्र, प्रभाव, अध्यासन, अवस्थान आदि दिये गये हैं। उपनिषद् के अनुसार पाँच रूपों के त्यागने और अपने स्वरूप में स्थित होने से जो सत्ता (अधिष्ठान) शेष रहती है, उसे परम तत्त्व कहते हैं- पञ्चरूपपरित्यागात्स्वरूपप्रहाणतः । अधिष्ठानं परं तत्त्वमेकं सच्छिष्यते महत् (बह्व० ६)। ११. अनन्त - उस व्यापक-विराट् सृष्टि की रचना करने वाले परमात्मा को अनन्त कहा गया है। यह समूची सृष्टि अन्तहीन, अपरिमित, अप्रमेय या अनन्त है, इसकी रचना करने वाला परमात्मा भी अनन्त ही है। उपनिषद् में यह