१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तःकरण चतुष्टय [परिशिष्ट] ४३३
तथ्य प्रतिपादित है कि उसे अनन्त इसलिए कहा जाता है कि उसका उच्चारण करते समय नीचे, ऊपर और तिर्यक् कहीं भी अन्त देखने में नहीं आता-यस्मादुच्चार्यमाण एवाद्यन्तं नोपलभ्यते तिर्यगूर्ध्वमधस्तात् तस्मादुच्यते अनन्तः (अ०शिर० ४८)। दिशा को तथा साम को अनन्त कहकर निरूपित किया गया है-अनन्ता हि दिशः (बृह० ४.१.५)। अनन्तं साम (जैमि० १.३५.८)। वह अनन्त परमात्मा व्यक्त-अव्यक्त सृष्टि प्रपञ्च में पूर्ण व्यापक और चैतन्यरूप है-अव्यक्तादि सृष्टिप्रपञ्चेषु पूर्णं व्यापकं चैतन्यमनन्तमित्युच्यते (स०सा० १२)।
१२. अन्तःकरण चतुष्टय— शरीर के अंग-अवयव जिस शक्ति से अपना कार्य-व्यापार सम्पन्न करते हैं, उसे 'इन्द्रियशक्ति' कहते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि शरीरस्थ चैतन्य अंश (जीवात्मा) जिनके माध्यम से कर्त्ता-भोक्ता की भूमिका सम्पन्न करता है, वे इन्द्रियाँ (करण)-साधन कहलाते हैं। ये मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं-१. अन्तरिन्द्रिय, २. बाह्येन्द्रिय। अन्तरिन्द्रिय, जो शरीर के अन्दर सक्रिय होती है, बाहर से उसका कुछ भी स्वरूप प्रकट नहीं हो पाता। इनकी संख्या ४ मानी गयी है। दूसरे शब्दों में इन्हें अन्तःकरण (अन्तरिन्द्रिय) चतुष्टय कहा जाता है। वे हैं- मन, बुद्धि,चित्त और अहंकार। आचार्य शंकर ने अपने विवेक चूड़ामणि में लिखा है- निगद्यतेऽन्तःकरणं मनो धीरहंकृतिश्चित्तमिति स्ववृत्तिभिः (वि० चू० ९५)। अर्थात् अपनी वृत्तियों के कारण अन्तःकरण मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार-इन चार नामों से कहा जाता है। वस्तुतः अन्तःकरण-अन्तरिन्द्रिय एक ही है-मन, वह अपनी वृत्तियों-कार्यों के आधार पर चार रूपों वाला हो जाता है। संकल्प-विकल्प के कारण मन, पदार्थ का विवेकपूर्वक निश्चय करने के कारण बुद्धि, अपना इष्ट चिन्तन करने के कारण चित्त तथा अहं-अहं (मैं- मैं) ऐसा स्वानुभूतिजन्य अभिमान करने के कारण अहंकार कहलाता है-मनस्तु संकल्पविकल्पनादिभिर्बुद्धिः पदार्थाध्यवसायधर्मतः॥ अत्राभिमानादहमित्यहंकृतिः स्वार्थानुसन्धानगुणेन चित्तम्॥ (वि० चू० ९६)। बाह्येन्द्रिय वह होती है, जिसका स्वरूप बाहर से भी प्रकट होता है। यह पुनः दो प्रकार की होती है-१. ज्ञान प्राप्ति की हेतुभूता, २. कर्म सम्पादन की हेतुभूता। ज्ञान प्राप्ति को कारणभूता इन्द्रिय-ज्ञानेन्द्रिय कहलाती है। इसकी संख्या पाँच है-श्रवण, त्वचा, नेत्र, घ्राण और जिह्वा। कर्म सम्पादन समर्था इन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय कहलाती है, इसकी संख्या भी पाँच है-वाक्, पाणि, पाद, गुदा और उपस्थ। इन दसों इन्द्रियों का आचार्य शंकर ने इस प्रकार उल्लेख किया है-बुद्धीन्द्रियाणि श्रवणं त्वगक्षि, घ्राणं च जिह्वा विषयावबोधनात्। वाक्पाणिपादं गुदमप्युपस्थः **कर्मेन्द्रियाणि प्रवणेन कर्मसु॥ (वि० चू० ९४)**अर्थात् श्रवण (सुनने की शक्ति), त्वचा (स्पर्शज्ञान की शक्ति), नेत्र (देखने की शक्ति), घ्राण (सूँघने की शक्ति) और जिह्वा (स्वादानुभूति की शक्ति)-ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, क्योंकि इनसे विषय का ज्ञान होता है तथा वाक् (वाणी), पाणि(हाथ),पाद (पैर), गुदा (मल विसर्जन अंग) और उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय)-ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं, क्योंकि इनका कर्मों की ओर झुकाव होता है। इस प्रकार कुल इन्द्रियाँ (मन, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय मिलकर) ग्यारह हो जाती हैं।
१३. अन्तर्मुख-बहिर्मुख— जिस साधक की वृत्ति आन्तरिक हो, अर्थात् अन्तःकरण की ओर प्रवृत्त होती हो, जो अपने ही विचारों और भावनाओं में तल्लीन रहता हो, वह अन्तर्मुख या आत्मरत कहा जाता है। अन्तर्मुख पुरुष अपनी इन्द्रियों और मन को हठात् आन्तरिक उत्थान में नियोजित कर आत्मशक्ति संचय करता और आत्म उत्कर्ष में लगा रहता है। अन्त में आत्मा में ही विराट् परमात्म चेतना से सम्बद्ध हो जाता है। बहिर्मुख व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को रस, रूप, गन्ध, स्पर्श और शब्द के सुखों में लगाता हुआ आन्तरिक शक्ति और मानसिक शक्ति को खोता चला जाता है। आत्मज्ञानी साधक बाह्य व्यवहार करता हुआ भी अन्तर्मुख रहता है और सदा थके हुए के समान सोता सा दिखाई देता है-अन्तर्मुखतया तिष्ठन्बहिर्वृत्तिपरोऽपि सन्। परिश्रान्ततया नित्यं निद्रालुरिव लक्ष्यते (अक्षि० २.३६)। वह सुषुप्त अथवा बुद्ध अवस्था में भी अन्तर्मुख रहता है-अन्तर्मुखतया नित्यं सुप्तो बुद्धो व्रजन्यठन् ॥ (अ०पू० १.३४)
१४. अन्तर्यामी-साक्षी— उस व्यापक परमात्मा के विभिन्न विशेषणों का निरूपण किया जाता है। वह व्यापक देव घट-घट व्यापी होने से अन्तर्यामी कहा गया है। वह सब कुछ देखने और जानने वाला होने से साक्षी भी कहा गया है। अन्तः-स्थित चैतन्य पुरुष को ही कूटस्थ, क्षेत्रज्ञ, अन्तर्यामी और साक्षी कहते हैं। यह जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में उत्पत्ति और लय को जानने वाला और स्वयं उत्पत्ति और लय से परे रहने वाला जो नित्य