१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 432, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ें४३८ [परिशिष्ट] आवागमन-चक्र ३०. आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक — सम्पूर्ण विषयों या ज्ञान को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है- १. आधिभौतिक २. आधिदैविक ३. आध्यात्मिक। अन्यान्य प्राणियों के शरीरों अथवा स्थूल भौतिक तत्त्वों से सम्बन्धित विषय आधिभौतिक कहलाते हैं। दैवीय गुणों या देव सम्बन्धी विषयों को आधिदैविक कहा गया है। मन अथवा आत्म तत्त्व से सम्बन्धित विषय आध्यात्मिक कहलाते हैं। केनोपनिषद् में आध्यात्मिक तथ्य (उदाहरण) इस प्रकार है कि हमारा मन ब्रह्म के समीप जाता हुआ प्रतीत होता है, उस ब्रह्म का निरन्तर तीव्रता से स्मरण करता है, इसी मन के द्वारा ब्रह्म प्राप्ति का संकल्प लेता है- अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णः सङ्कल्पः (केन० ४.५)। ३१. आनन्द-परमानन्द — आनन्द का शाब्दिक अर्थ है- सम्यक् रूप से प्रसन्नता (आ+नन्द)। यह आत्मा अथवा परमात्मा के तीन अनिवार्य गुणों (सत्+चित्+आनन्द) में से एक है। अतः यह आत्मतत्त्व से सम्बन्धित है। आत्मा पञ्चकोशों के आवरण में आबद्ध है- जिनमें अन्तिम पंचमकोश आनन्दमय कोश है। यह विशिष्ट आध्यात्मिक सुख है। उपनिषद् के अनुसार आनन्द से ही सभी भूत (प्राणी) उत्पन्न होते हैं, आनन्द से ही जीवित रहते हैं और आनन्द में ही विलीन हो जाते हैं- आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभि संविशन्तीति (तैत्ति० ३.६)। उपनिषदों में अनेक स्थानों पर आत्मा के आनन्दस्वरूप होने का उल्लेख मिलता है- आनन्दरूपममृतं यद्विभाति (मुण्ड०२.२.७), आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् (तैत्ति० ३.६.१), आनन्द आत्मा (तैत्ति०२.५.१)। आत्मा को परमानन्द स्वरूप भी कहा गया है। इसका तात्पर्य निरतिशय सुखस्वरूप अथवा सर्वोच्च आनन्द स्वरूप से है। ब्रह्म की आनन्दरूपता को 'रसो वै सः' (तैत्ति० २. ७) के द्वारा भी प्रतिपादित किया गया है। ब्रह्म अपार अथवा अनन्त आनंद का सागर है। ३२. आपः — आपः शब्द विशेषतया 'जल' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इसीलिए बादल के लिए आपधर और समुद्र के लिए आपनिधि शब्द प्रयुक्त हुआ है। जल के प्रवाह या आकाश के लिए भी आपः शब्द का उपयोग किया जाता है। आकाश में सतत संचरणशील प्रवाह या आकाशीय ईथर तत्त्व से भी इसकी संगति बिठाई गयी है। संभवतः प्राणरूप होने के कारण आपः को तुलना अन्न से को गयी है- आपो वा अन्नम् (तैत्ति० ३.८.१)। आपः (जल) में तेज प्रतिष्ठित है और तेज में आपः-अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः (तैत्ति०३.८.१)। वैदिक संहिताओं में आपः देवता को कई सूक्तों में स्तुति को गयी है, यहाँ इसका भावार्थ प्रायः सूक्ष्म आकाशीय तत्त्वों (सृष्टि संरचना की मूलभूत इकाई) के रूप में लिया गया है। आपः को प्राणरूप में भी निरूपित किया गया है- प्राणो ह्वापः (जैमि० ३.१०. ९)। वरुणदेव जल में प्रतिष्ठित हैं- स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति। अप्स्विति (बृह०३.९.२२)। सम्पूर्ण देवगणों को भी आपः से सम्बद्ध बताया गया है-आपो वै सर्वा देवताः (ना०प०३.७९)। ३३. आयतन — आयतन शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं- स्थान, मंदिर, विश्रामालय आदि। पुराणों में पवित्र स्थान, मंदिर आदि अर्थ में आयतन शब्द प्रयुक्त हुआ है, जैसे- देवायतन, शिवायतन आदि। विष्णु भगवान् को मङ्गल का आयतन कहकर निरूपित किया गया है- मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुडध्वजः। मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलायतनो हरिः ॥ छान्दोग्योपनिषद् में वर्णन मिलता है कि जो आयतन को जानता है, वह अपने बन्धु-बान्धवों का आयतन (आश्रय) होता है। निश्चय ही मन (सम्पूर्ण इन्द्रियों का) आयतन है- यो ह वा आयतनं वेदायतनः ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् (छान्दो० ५.१.५)। प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन- यह चतुष्कल पाद ब्रह्म का आयतनवान् नाम वाला है-प्राणः कला। चक्षुः कला। श्रोत्रं कला। मनः कला। एष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम (छान्दो० ४.८.३)। ३४. आवागमन-चक्र — बार-बार जन्म लेना और मरना, भूतल पर आना और जाना, जीवात्मा का विभिन्न योनियों में परिभ्रमण करना आवागमन-चक्र कहलाता है। सभी हिन्दू दार्शनिक और धार्मिक सम्प्रदायों की यह मान्यता है कि जब तक जीव को मोक्ष प्राप्त नहीं होता, वह आवागमन-चक्र में परिभ्रमण करता रहता है। अच्छे-बुरे कर्मों के आधार पर उसे ८४ लाख योनियों में से किस योनि में पुनर्जन्म होगा, इसका निर्धारण होता है। आवागमन-चक्र को भव-बन्धन, संसार चक्र या जन्म-मरण चक्र भी कहते हैं। गीता में कहा गया है कि प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला और पापों को धो डालने वाला अनेक जन्मों के बाद सिद्ध होकर फिर परमगति (मुक्ति) को प्राप्त करता है-