१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 433, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंआशा ( परिशिष्ट ) ४३९ प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥ (गी० ६.४५) जो आकाश में स्थित निष्कल तत्त्व का ध्यान करता है, वह भवबन्धन से मुक्त हो जाता है-नभस्थं निष्कलं ध्यात्वा मुच्यते भवबन्धनात् (ब्र०बि०२०)। ३५. आशा — किसी अप्राप्त के पाने की इच्छा को आशा कहते हैं। अभिलषित वस्तुओं के लिए भी आशा शब्द प्रयुक्त हुआ है। ऋषि कहते हैं, पितृगण के लिए स्वधा, मनुष्यों के लिए आशा (इष्ट वस्तुएँ), पशुओं के लिए तृण और जल का आगान करूँ-आशां मनुष्येभ्यः ( आगायानि ) (छान्दो० २.२२.२)। देवगण निश्चय ही सम्पूर्ण विश्व को आशाओं का प्रतिरक्षण करते हैं- एता ह वै देवता विश्वा आशाः प्रतिरक्षन्ति (जैमि० १.३४.११)। जगत् में सर्वप्रथम आशा ही थी, भविष्य में भी वही है, तब सर्वप्रथम अप् तत्त्व संन्यास हुआ-आशा वा इदमग्र आसीद् भविष्यदेव। तदभवत् । ता आपोऽभवन् (जैमि० ४. २२. १)। उपनिषद् में आशा को पिशाचिनी कहा गया है, जो अन्तःकरण में पाये जाने वाले आनन्द के आश्रय में रहती है-आनन्दमंतर्निजमाश्रयन्तमाशापिशाचीमवमानयन्तम् (मैत्रे० १.१२)। मनुष्य अपनी पत्नी को तरह सम्पूर्ण जीवन भर 'आशा' की पूर्ति के लिए अपनी शक्तियों का व्यय करता रहता है, अतः उपनिषद् में निर्देश है कि आशारूप पत्नी को त्यागने वाला तत्काल ही मुक्ति को प्राप्त होता है- आशापत्नीं त्यजेद्भावत्तावन्मुक्तो न संशयः (मैत्रे० २.१२)। ३६. आसक्ति —द्र०- मोह। ३७. आस्तिकता — वेद, परमेश्वर और परलोक इत्यादि में विश्वास करने वाला अथवा ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारने वाला अथवा ईश्वर की सर्वव्यापकता और न्यायकारिता का अनुभव करने वाला आस्तिक और उनका यह गुण आस्तिकता कहलाता है। दर्शन ग्रन्थों में ईश्वर या वेद के प्रति विश्वास दृष्टिगोचर होता है। ईश्वर सर्वव्यापी और न्यायकारी है, ईश्वर की इस सत्ता पर विश्वास ही आस्तिकता है। शंकराचार्य के अनुसार मोक्ष और वेद में श्रद्धा रखना ही आस्तिकता है। मनुस्मृति में भगवान् मनु ने कहा है-नास्तिको वेद निन्दकः अर्थात् वेद का निन्दक ही नास्तिक है। विद्वानों ने नास्तिक को व्युत्पत्तिपरक व्याख्या इस प्रकार को है-नास्ति ( परलोक ) इति मतिर्यस्य स नास्तिकः (अष्टा० ४.४.६० की वृत्ति) 'जिसकी मति परलोक की सत्ता में विश्वास नहीं रखती, वह नास्तिक है'। ३८. इन्द्रिय दमन — शरीर के वे अंग जिनकी शक्ति हमें विषयों का ज्ञान या बोध कराती है 'इन्द्रियाँ' कहे जाते हैं। संस्कारों के प्रभाववश मनुष्य प्रायः इन्द्रियों के माध्यम से अपनी जीवनीशक्ति विषयभोग और कायिक लिप्साओं में गँवाता जाता है। इन्द्रियों को तुष्टि के लिए वह प्रायः फुलझड़ी की तरह अपना बहुमूल्य जीवन रस जलाता रहता है। साधक को योग पथ पर सर्वप्रथम इन्द्रियों को दबाना या बलपूर्वक शान्त करना पड़ता है। इन्द्रियों के नियंत्रण या निरोध की इस प्रक्रिया को इन्द्रिय दमन या इन्द्रिय निग्रह कहते हैं। इसी के द्वारा साधक शक्ति संचय करता हुआ ईश्वर या ब्रह्म से योग प्राप्त करने की स्थिति में हो पाता है। गीता के अनुसार जिसकी इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है-वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता (गी०२.६१)। उपनिषद् में इन्द्रिय निग्रह को ही शौच (शुचिता) कहकर निरूपित किया गया है-शौचम् इन्द्रियनिग्रहः (मैत्रे०२.३)। प्रजापति ने देवों को उपदेश किया था-हे भोग प्रधान देवो ! इन्द्रियों का दमन करो (बृह०५.२.३)। ३९. इन्द्रियाँ —द्र० - अन्तःकरण चतुष्टय। ४०. इष्टापूर्त — वेद का पठन-पाठन, अग्निहोत्र और अतिथि सत्कार इष्ट कहलाते हैं और कुआँ, तालाब खुदवाना, देवमंदिर बनवाना, बगीचा लगाना आदि कर्म पूर्त कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में यज्ञ-यागादि अदृश्य फल वाले कर्मों को इष्ट कहते हैं और लोकहितकारी दृश्य फल वाले कर्मों को पूर्त कहते हैं अर्थात् लोक-परलोक के हितकारी सभी कर्मों को इष्टापूर्त कहते हैं। आत्मज्ञान को प्रधान मानने वाली उपनिषद् में वर्णन मिलता है कि इष्टापूर्त कर्मों को ही श्रेष्ठ मानने वाले विमूढ़ लोग उससे भिन्न यथार्थ श्रेय को नहीं जानते-इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः (मुण्ड० १.२.१०)। कठोपनिषद् में वर्णन है कि ब्राह्मण का सत्कार न करने वाले के उत्तमवाणी के फल और इष्टापूर्त कर्मों के फल का नाश हो जाता है (कठ०१.१.८)। मनुष्यों में जो लोग इष्टापूर्त कर्मों को ही करने योग्य कर्म मानकर उनकी उपासना करते हैं, वे चन्द्रमा के लोक को ही जीतते हैं- तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते (प्रश्न०१.९)।