१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 434, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ें४४० परिशिष्ट उपनिषद् ४१. ईश्वर-जीव — अद्वैत वेदान्त में 'एकमेवाद्वितीयम्' जैसे श्रुति वचनों द्वारा जिस नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, कूटस्थ, निष्क्रिय, अविकारी आदि विशेषणों से विभूषित परम चैतन्य का प्रतिपादन है, उसी को 'ब्रह्म' कहा गया है। 'ब्रह्म' के दो रूपों की परिकल्पना वेदान्त ग्रन्थों में प्राप्त होती है-प्रथम-परब्रह्म, द्वितीय-अपरब्रह्म। 'परब्रह्म' वह है, जो अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम् ......अर्थात् शब्दस्पर्शादिरहित, शुद्ध-बुद्ध, मुक्त स्वभाव वाला है। यह अविकारी और कूटस्थ है। यही 'ब्रह्म' जब सृष्टि-सृजन हेतु संकल्पवान् होता है, तो माया की शक्ति से समन्वित हो जाता है, इसे 'अपरब्रह्म' या 'सगुणब्रह्म' कहते हैं। इसी अपरब्रह्म को 'ईश्वर' भी कहा जाता है। 'माया' से परिच्छिन्न होने पर ही ब्रह्म का ईश्वरत्व, सर्वज्ञत्व तथा जगत् कारणत्व आदि सिद्ध होता है। जैसा कि विद्यारण्य स्वामी ने लिखा है- तच्छक्त्युपाधिसंयोगाद् ब्रह्मैवेश्वरतां व्रजेत् (पंच०३.४०)। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि माया को उपाधि से अवच्छिन्न (संयुक्त) ब्रह्म ही ईश्वर है। माया ईश्वर के अधीन होती है और जब माया (अविद्या) चैतन्य को अपने वशीभूत कर लेती है, तो वह अविद्याग्रस्त चैतन्य 'जीव' कहा जाता है। माया से संयुक्त, किन्तु माया को अपना वशवर्ती बनाने वाला चैतन्य ईश्वर और माया का वशवर्ती बना चैतन्य 'जीव' कहा जाता है, वस्तुतः ये दोनों उस परब्रह्म के ही रूप हैं। 'ईश्वर' को जगत् का निमित्त कारण माना जाता है। जैसे कुम्भकार घड़ा बनाता है, तो घड़े का निमित्त कारण कुम्भकार हुआ, किन्तु घड़ा बनता है मिट्टी से, इसलिए मिट्टी 'उपादान' कारण है, परन्तु जगत् के निर्माण में ईश्वर निमित्त कारण भी है और उपादान कारण भी, क्योंकि वही विविध नाम रूपात्मक जगत् के रूप में परिणत हो जाता है, जैसे मकड़ी जाला बनाती है, तो जाला बनाने की योग्यता के कारण वह निमित्त कारण होती है और जाला बनाने का पदार्थ भी अपने भीतर शरीर से ही निःसृत करती है, इसलिए वही उपादान कारण भी होती है। आवरण और विक्षेप शक्ति के आधार पर ईश्वर की उपादान कारणता सिद्ध होती है। जैसे रस्सी में सर्प की प्रतीति। आवरण शक्ति से 'रस्सी' का स्वरूप ढँक जाता है और विक्षेप शक्ति से 'रस्सी' के स्थान पर सर्प की प्रतीति होने लगती है। इसी तरह से आवरण शक्ति से ईश्वर का स्वरूप ढँक जाता है और विक्षेप द्वारा ईश्वर जगत् के रूप में दिखने लगता है। इस प्रकार 'ईश्वर' जगत् का निमित्त कारण तथा उपादान कारण दोनों है। जैसा कि डॉ० राधाकृष्णन् जी ने लिखा है-'ईश्वर' बिना साधनों से सृष्टि रचना करता है। अपनी महान् शक्तियों के द्वारा वह अपने को अनेक कार्यरूपों में परिणत कर लेने में समर्थ है। ४२. उद्गीथ — उद्गीथ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- उद्+गै+थक्। अमरकोश के अनुसार इसका अर्थ है- प्रणवः सामवेद ध्वनिः इत्यरुणः (५.१९ वृत्ति)। उद्गीथ एक प्रकार का सामगान है। प्रणव अथवा ओंकार को भी उद्गीथ कहा गया है। ॐ यह अक्षर उद्गीथ का प्रतीक है- ओमित्येतदक्षरमुद्गीथः (छान्दो०१.१.५)। साम के भेद या विभाग इस प्रकार किये गये हैं- हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार, उपद्रव और निधन। यहाँ प्राण को उद्गीथ रूप वर्णित किया गया है- मन एव हिंकारो वाक् प्रस्तावः प्राण उद्गीथः (जैमि०१.३३.३)। उद्गीथ को देवों के लिए अमृत कहा गया है-उद्गीथं देवेभ्योऽमृतम् (जैमि० १.११.८)। जो उद्गीथ है, वही प्रणव अक्षर है और जो प्रणव है, वही उद्गीथ है। विचरणशील सूर्य भी उद्गीथ ही है- अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथः (छान्दो०१.५.१)। वाणी का रस ऋचा है, ऋचा का रस साम है और साम का रस उद्गीथ है- वाचः ऋग्रसः ऋचः सामरसः साम्नः उद्गीथो रसः (छान्दो०१.१.२)। ४३. उपनिषद् — 'उपनिषद्' शब्द की व्युत्पत्ति में सद् 'षदॢ विशरणगत्यवसादनेषु' धातु के पहले 'उप' और 'नि' ये दो उपसर्ग और अन्त में 'क्विप्' प्रत्यय लगता है। जिसका भावार्थ है-गुरु के निकट गूढ़ धर्म एवं रहस्यमय ज्ञान प्राप्ति के लिए बैठना। अमरकोश में उपनिषद् शब्द का अर्थ (धर्मे रहस्युपनिषत् स्यात् ) गूढ़ धर्म एवं रहस्य लिया गया है। उपनिषद् में जीवन और जगत् के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन, निरूपण तथा विवेचन है। वैदिक साहित्य के चार भाग किये गये हैं-१. संहिता, २. ब्राह्मण, ३. आरण्यक तथा ४. उपनिषद्। वैदिक साहित्य का अन्तिम भाग होने से उपनिषद् वेदान्त भी कहा जाता है। उपनिषद् का प्रमुख विषय ब्रह्म का निरूपण होने से इन्हें ब्रह्मविद्या भी कहा गया है। उपनिषदों में दो प्रकार की विद्याओं का उल्लेख है- १. परा और २. अपरा। पराविद्या ब्रह्मविद्या है, जिसका प्रमुख प्रतिपाद्य विषय ब्रह्म है। अपरा विद्या के अन्तर्गत संहिताओं, ब्राह्मणों तथा