१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपप्राण [परिशिष्ट] ४४१
वेदाङ्गों का विवेचन दृष्टिगोचर होता है। उपनिषदों को कालक्रम के आधार पर दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-१. प्राचीन उपनिषद्, २. परवर्ती उपनिषद्। प्राचीन उपनिषद् वैदिक शाखाओं पर आधारित हैं। परवर्ती उपनिषद् मध्ययुग के धार्मिक सम्प्रदायों की देन हैं। उस ब्रह्म विषयक (ब्राह्मी) उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) का विवरण केनोपनिषद् में मिलता है। उस ब्रह्मविद्या के तीन आधार हैं- तप, दमन (इन्द्रिय-निग्रह) और निष्काम कर्म। सम्पूर्ण वेद उसी के अङ्ग हैं और सत्यरूप परमात्मा ही उसका अधिष्ठाता है-ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति। तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा। वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् (केन०४.७-८)। साधक यथार्थ तत्त्व को प्रकट करने वाली (उपनिषद्) विद्या के द्वारा जो कुछ भी श्रद्धापूर्वक करता है, वही अधिकाधिक सामर्थ्ययुक्त होता है- यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति (छान्दो०१.१.१०)।
४४. उपप्राण - द्र० - प्राण।
४५. उपाधि- जो वस्तु जिस विशेष रूप में दिखाई देती है, उस विशेष रूप को उस वस्तु को उपाधि कहते हैं अथवा जिसके संयोग से कोई वस्तु किसी विशेष रूप में दिखाई देती है, उसे उस वस्तु की उपाधि कहते हैं। जैसे साधारण वस्त्र जब किसी रंग विशेष में रंग दिया जाता है, तो वह उसी रंग का-लाल, नीला हो जाता है। यह लाल, नीला रंग उस वस्त्र को उपाधि कहलाता है। वेदान्त दर्शन में माया के संयोग या असंयोग से ब्रह्म के दो भेद निरूपित किये गये हैं- सोपाधि ब्रह्म (जीव) और निरुपाधि ब्रह्म। सोपाधि ब्रह्म की ब्रह्म का सगुणरूप तथा निरुपाधि ब्रह्म को ब्रह्म का निर्गुण रूप स्वीकार किया गया है। वह परब्रह्म त्वं और तत् आदि उपाधियों से भी परे है। मन आदि सूक्ष्म तत्त्वों की उपाधि जो आत्मा के साथ संयुक्त रहती है, उसे लिङ्ग शरीर कहते हैं।
४६. उपासना- जीव अपने इष्ट से एकाकार होने का अभ्यास जिस प्रक्रिया से करता है, उसे उपासना कहते हैं। इसमें भक्त भगवान् के प्रति समर्पण का अभ्यास करता है और शनैः-शनैः तद्रूप होने लगता है। उपासना का अर्थ पास बैठना (उप= समीप+आसन= बैठना) अथवा सेवा के रूप में विशेष रूप से लिया जाता है। कहीं-कहीं इसका अर्थ उपवास करना भी लिया गया है। उपनिषद् में कहा गया है जो केवल अविद्या (पदार्थपरक विद्या) की उपासना करते हैं, वे घोर अंधकार में फँस जाते हैं और जो केवल विद्या (चेतनापरक) की उपासना करते हैं, वे भी घोर अंधकार में फँस जाते हैं (ईश०९)। उपासना को ब्रह्म साक्षात्कार का साधन स्वीकार किया गया है। उपासना से साधक का चित्त एकाग्र हो जाता है। यह चित्त की एकाग्रता निर्विशेष ब्रह्म का साक्षात्कार कराने में समर्थ है- सगुणोपासनमपि चित्तैकाग्र्य द्वारा निर्विशेषब्रह्मसाक्षात्कारे हेतुः (वे०परि०)।
४७. ऋत-सत्य- प्रिय भाषण या सत्य वचन के अर्थ में सामान्यतः ऋत शब्द का प्रयोग होता है। इसके अन्य पर्यायवाची शब्द हैं- मोक्ष, जल, कर्मफल, यज्ञ, सूर्य, ब्रह्म, प्राकृतिक नियम, ईश्वरीय नियम, अनुकूल वचन। ऋत शब्द का प्रयोग अनुकूल वचन के अर्थ में इस प्रकार हुआ है- ऋतं वदिष्यामि (तै०आ०७.१.१)। ऋतं च सत्यं च वदत (तै०सं०३.२.७.१)। यज्ञ को भी ऋत कहा गया है- एष वा ऋतस्य पन्था यद्यज्ञः (मै०ब्रा०४.८.२), यज्ञो वाऽ ऋतस्य योनिः (शत०ब्रा०१.३.४.१६)। ॐ तथा ब्रह्म को भी ऋत से सम्बद्ध किया गया है- ओमित्येतदेवाक्षरममृतम् (जैमि०३.३६.५), ब्रह्म वा ऋतम् (शत०ब्रा०४.१.४.१०)। मन को भी ऋत कहकर निरूपित किया गया है-मनो वा ऋतम् (जैमि०३.३६.५)। वस्तुतः शाश्वत अटल नियम को ऋत कहते हैं और देश, काल के अनुसार बदल जाने वाले नियम को 'सत्य' कहते हैं। जल का नीचे की ओर प्रवाहित होना, अग्नि की लपटों का ऊपर की ओर उठना, सूर्य का उदय पूर्व दिशा में होना इत्यादि शाश्वत नियमों को 'ऋत' कहेंगे और ठण्डक के दिनों में भारत में दिन का छोटा होना, रात्रि का बड़ा होना, गर्मी में दिन का बड़ा होना, रात्रि का छोटा होना जैसे नियम देश, काल के अनुसार बदलते हैं, सर्दी-गर्मी का मौसम बदलता रहता है। यह सत्य है, किन्तु ऋत नहीं।
४८. ऋत्विज्- यज्ञ कराने वाले-याज्ञिक को ऋत्विज् कहा गया है। ऋत्विजों में चार प्रमुख होते हैं-ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता और उद्गाता। कहीं-कहीं प्रमुख ऋत्विजों को संख्या सात मानी गई है- होता, पोता, नेष्टा, आग्नीध्र, प्रशास्ता, अध्वर्यु और ब्रह्मा। ब्रह्मा यज्ञ की देखरेख मौन रहकर करता था। अध्वर्यु यज्ञ में व्यावहारिक कार्य-निर्देश एवं व्याख्या करता था। होता ऋचाओं का-यज्ञमंत्रों का उच्चारण तथा देवस्तुति करता था। उद्गाता का सम्बन्ध यज्ञ में