भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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४४२ [परिशिष्ट] एकादशद्वार-एकादश अक्ष गायन (सामगान आदि) से होता था। बड़े यज्ञों में इन चारों ऋत्विजों के तीन-तीन अन्य सहयोगी भी होते थे। इस प्रकार यज्ञ में सोलह ऋत्विज् वरण किये जाते थे-षोडशर्त्विजो ब्रह्मोद्गातु होत्रध्वर्यु...... (का०श्रौ० ७.१.७)। चत्वारस्त्रिपुरुषाः। तस्य तस्योत्तरे त्रयः (आ०श्रौ०४.१.४-५)। ब्रह्मा के सहयोगी ऋत्विज्-ब्राह्मणाच्छंसी, आग्नीध्र एवं पोता, अध्वर्यु के सहयोगी ऋत्विज्-प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा और उन्नेता, होता के सहयोगी ऋत्विज्-मैत्रावरुण, अच्छावाक् और ग्रावस्तुत् एवं उद्गाता के सहयोगी ऋत्विज्-प्रस्तोता, प्रतिहर्ता एवं सुब्रह्मण्य होते थे। ४९. ऋद्धि-सिद्धि — ऋद्धि भौतिक समृद्धि का द्योतक है और सिद्धि आध्यात्मिक विभूति या सफलता आदि का द्योतक है। दूसरे शब्दों में ऋद्धि-सिद्धि समृद्धि और सफलता का बोधक है। ऋद्धि को लौकिक सुख-सम्पदा से तथा सिद्धि को अलौकिक शक्ति या विभूति से सम्बद्ध किया जाता है। योग की अष्टसिद्धियाँ प्रसिद्ध हैं- अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। भगवान् ने गीता में कहा है कि मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ तू सिद्धि को प्राप्त होगा-मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि (गी० १२.१०)। ५०. ऋषि — वेद मन्त्रों का द्रष्टा या उनका साक्षात्कार करने वाला या आध्यात्मिक तत्त्वों का द्रष्टा और प्रयोक्ता ऋषि कहलाता है। वेद मन्त्रों का अनुभूतिजन्य तत्त्वदर्शन समझने वाले, त्रिकालज्ञ, दिव्यदृष्टि सम्पन्न परोक्ष द्रष्टा को भी ऋषि कहते हैं। रत्नकोष के अनुसार ऋषि सात प्रकार के हैं-ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि, राजर्षि। भिन्न-भिन्न मन्वन्तरों में भिन्न-भिन्न ऋषि हुए हैं। इस वैवस्वत मन्वन्तर के सप्तर्षि ये हैं-कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज। अपाला, विश्ववारा, घोषा, सूर्या आदि महिलाओं ने भी वैदिक काल में ऋषित्व को प्राप्त किया था। उपनिषद् में वर्णन है कि ऋषिगण जो आसक्ति से परे विशुद्ध अन्तःकरण वाले होते हैं, वे परमात्मा को प्राप्त होकर ज्ञान से तृप्त और परम शान्त हो जाते हैं- संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः (मुंड० ३.२.५)। गीता में भी वर्णन मिलता है कि निष्पाप, छल, कपटरहित संयत आत्मा वाले सब प्राणियों के हित में रत रहने वाले, ऋषिगण ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करते हैं-लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः (गी० ५.२५)। ५१. एकत्व-ऐक्य — उपनिषदों में जीव और ब्रह्म में-आत्मा और परमात्मा में एकत्व-ऐक्य (एक होने का भाव) प्रतिपादित किया गया है। जीवो ब्रह्मैव नापरः; एकमेवाद्वितीयम् (छान्दो० ६.२.१)। ब्रह्म ही अज्ञान की उपाधि से संयुक्त होकर जीव कहलाता है। एक ही ईश्वर (इन्द्र) माया से संयुक्त होकर विविध रूपों को प्राप्त होता है-इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते (ऋ० ६.४७.१८)। एक ही परमात्मा प्रत्येक प्राणी में अवस्थित होकर उसी प्रकार विविध रूपों में दिखाई दे रहा है, जैसे चन्द्रमा एक होते हुए विभिन्न जलों में विविध रूपों में दिखाई देता है- एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्॥ (ब्र० बि० १९) गीता में श्रीकृष्ण का कथन है कि कुछ ज्ञानयज्ञ द्वारा एकत्व (अद्वैत) भाव से और पृथकत्व (द्वैत) भाव से विराट् पुरुष की उपासना करते हैं-ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् (गी० ९.१५)। ५२. एकर्षि अग्नि — मुण्डकोपनिषद् में वर्णित है कि जो निष्काम कर्मनिष्ठ, श्रुतिज्ञान के ज्ञाता और ब्रह्म के उपासक एकर्षि नामक अग्नि में श्रद्धापूर्वक हविष्यान्न अर्पित करते हैं, उन्हीं को विधिपूर्वक ब्रह्मविद्या का उपदेश करना चाहिए-क्रियावन्त श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षिं श्रद्धयन्तः। तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम् (मुण्ड० ३.२.१०)। एकर्षि अग्नि का उल्लेख अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है। कुछ विद्वज्जन एकर्षि अग्नि की संगति आत्मज्योति रूप अग्नि से बिठाते हैं। कहीं इसे प्राणाग्नि अथवा आत्माग्नि के रूप में स्वीकार किया गया है। कुछ विद्वानों ने एकर्षि शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की है-एक एव ऋषति गच्छति अर्थात् जो एक (अकेला) गतिमान् रहता है। कुछ विद्वानों के अनुसार सभी देवताओं में जो अग्नि विद्यमान रहती है, उसी अग्नि में ही वे सभी आहुतियों को ग्रहण या धारण करते हैं, उसे ही एकर्षि अग्नि कहा जाता है। ५३. एकादशद्वार-एकादश अक्ष — मनुष्य शरीर को एकादश द्वारों वाला अथवा एकादश अक्ष कहा गया है। यह शरीर दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र, एक मुख, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुदा और उपस्थ इन ग्यारह द्वारों वाला है। वह विशुद्ध अजन्मा परमेश्वर एकादश द्वारों वाले मनुष्य शरीर में रहता है, उसका ध्यान-अनुष्ठान करके मनुष्य कभी शोक नहीं करता और जीवनमुक्त होकर बन्धनों से मुक्त ही जाता है- पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः।