१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएषणात्रय परिशिष्ट ४४३ अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते (कठ० २.२.१)। उपनिषद् में ही मनुष्य शरीर को नवद्वार (दो आँख, दो कान, दो नासिका, एक मुख, एक गुदा, एक उपस्थ) वाला भी स्वीकार किया गया है-नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः (श्वेता० ३.१८)। ५४. एषणा त्रय - एषणा का शाब्दिक अर्थ इच्छा, चाह, प्रार्थना, याचना आदि है। सामान्य मनुष्य त्रय एषणा के बन्धन में फँसा होता है। ये एषणाएँ हैं-पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा। उपनिषद् में वर्णन है कि त्यागी पुरुष पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा से ऊँचे उठकर भिक्षाचर्या करते थे- ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति (बृह० ४.४.२२)। ब्राह्मण पुरुष भी आत्मा को जानकर त्रय एषणाओं से ऊँचे उठ जाते हैं (बृह०३.५.१)। परिव्राजक के लिए तीनों एषणाओं, तीनों वासनाओं, ममता एवं अहंकार का परित्याग करने का निर्देश है-एषणात्रयवासनात्रयममत्वाहंकारादिकं वमनान् (प०प० २)। ५५. ओङ्कार- ओङ्कार अथवा प्रणव परमात्मा का ही नाम अथवा प्रतीक है। ॐकार-यह अकार, उकार तथा मकार तीन वर्णों से बना हुआ है। ये तीनों अक्षर तीन शक्तियों-त्रिदेवों का बोध कराते हैं-अकारो विष्णुरुद्दिष्ट उकारस्तु महेश्वरः। मकारेणोच्यते ब्रह्मा प्रणवेन त्रयो मताः॥ इस प्रकार ॐ को ही ब्रह्म और सब कुछ स्वीकार किया गया है-ओमिति ब्रह्म। ओमितीदःसर्वम् (तैत्ति० १.८.१)। ओम् ही सभी मुमुक्षुओं का ध्येय है- ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वं मुमुक्षुभिः (ध्या०बि० ९)। ओम् ही उपास्य हैं, यही अपरिमित तेजरूप अग्नि आदित्य और प्राण है-तस्मादोमित्यनेनैतदुपासीताऽपरिमितं तेजः। तत् त्रेधाऽभिहितमग्नावदित्ये प्राणे (मैत्रा० ६.३७)। तीन अक्षरों के प्रणव के उच्चारण से योगी संसार के जन्म बन्धन से मुक्त हो जाते हैं-.....त्र्यक्षरं प्रणवं तदेतदोमिति। यमुक्त्वा मुच्यते योगी जन्मसंसारबन्धनात् (आ०बो०१)। ॐ अक्षर को जानकर जो जैसा चाहता है, वह वैसा पाता है- एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम्। एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् (कठ०१.२.१६)। ५६. कर्म- कर्म का सामान्य अर्थ क्रिया अथवा गति से है। दर्शन में इसे आध्यात्मिक तत्त्व कहा गया है, जिसे आत्मा संसार में वहन करता है। संसार में कर्मचक्र सुनिश्चित तथ्य है। निखिल ब्रह्माण्ड में देव, ग्रह, नक्षत्र तथा सभी चराचर अपने-अपने कर्म के कारण स्थित और गतिमान् हैं। उपनिषद् में इन्द्रियों द्वारा को जाने वाली क्रियाओं को कर्म कहा गया है, जो 'मैं करता हूँ', इस प्रकार को अध्यात्म निष्ठा से किया गया हो-कर्मेति च क्रियमाणेन्द्रियैः कर्माण्यहं करोमीत्यध्यात्मनिष्ठतया कृतं कर्मैव कर्म (निरा० ११)। गीता के अनुसार कर्म तीन प्रकार के कहे गये हैं-सात्त्विक, राजसी, तामसी। वेदों में तीन प्रकार के कर्मों का विधान है-नित्य, नैमित्तिक और काम्य। गीता के अनुसार सभी प्रकृति से उत्पन्न गुणों के अनुसार वशीभूत हुए कर्म करते हैं- कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः (गी० ३.५)। गीता में नियत कर्म करने का आदेश है, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है- नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः (गी० ३.८)। यज्ञ के लिए किये जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त अन्य कर्मों से यह लोक कर्म बन्धन में फँसता है, अतः आसक्ति रहित होकर यज्ञ के लिए कर्म करने का निर्देश आगे है- यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर (गी० ३.९)। कर्म की गति अत्यन्त गूढ़ है-गहना कर्मणो गतिः (गी०४.१७)। उपनिषद् कर्म करते हुए सौ वर्ष जीवित रहने की बात कहते हैं और यह भी कहते हैं कि इसके अतिरिक्त मनुष्य के कल्याण का और कोई मार्ग भी नहीं है- कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतःसमाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे (ईशा०२)। ५७. कर्मफल - मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है, परन्तु कर्मफल भोगने में पराधीन है। उसे किये हुए कर्मों का फल अवश्य मिलता है। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्मशुभाशुभम् (ना०पु० ३१.७०)। पिछले जन्मों का कर्मफल ही हमारा भाग्य या प्रारब्ध कहलाता है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- कर्म करने में आपका अधिकार है, फल प्राप्ति में कभी नहीं। कर्मों के फल की इच्छा मत करो, कर्म न करने में भी आसक्ति न रखो-कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि (गी० २.४७)। कर्मफल को त्यागकर युक्त पुरुष निष्ठा से भरी शान्ति को प्राप्त होता है- युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् (गी० ५.१२)। ध्यान से भी कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है, त्याग से शीघ्र शान्ति प्राप्त होती है, जैसा कि भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा है- ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् (गी० १२.१२)।