१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४४ [परिशिष्ट] क्षेत्रज्ञ ५८. कवि-मनीषी— कवि शब्द के अर्थ कोश ग्रन्थों में सर्वज्ञ, विचारवान्, प्रतिभाशाली, प्रशंसनीय, दूरदर्शी विद्वान्, त्रिकालज्ञ पुरुष, मनीषी आदि दिये गये हैं। मनीषी शब्द के अर्थ पंडित, विद्वान्, बुद्धिमान्, मेधावी, स्तोता आदि दिये गये हैं। उपनिषदों में उस परब्रह्म परमात्मा को ही कवि-मनीषी कहकर प्रतिपादित किया गया है- कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतो (ईश० ८)। गीता में कहा गया है कि क्या कर्म है और क्या अकर्म, इसमें कविगण (बुद्धिमान्) भी मोहित हो जाते हैं- किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः (गी० ४.१६)। गीता ८.९ में परमेश्वर को कवि कहा गया है। कवि त्रिकालदर्शी एवं सर्वज्ञ होता है। परमेश्वर कवि है, तो सृष्टि उसकी कविता, निर्माता होने के कारण भी उसे कवि कहते हैं। उस पुराण पुरुष, सर्वेश्वर, सब देवों के उपास्य देव को कवि कहकर उपन्यस्त किया गया है-कविं पुराणं पुरुषं सनातनं सर्वेश्वरं सर्वदेवैरूपास्यम् (महो० ४.७१)। ५९. कामधेनु— यह मान्यता है कि समुद्र मंथन के चौदह रत्नों में एक रत्न कामधेनु भी थी, जिससे जो माँगा जाय, उसकी पूर्ति हो जाती थी। सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ति करने वाली इस धेनु (गाय) को कामधेनु कहा गया। वसिष्ठ ऋषि के पास भी ऐसी ही एक कामधेनु थी, जिसे शबला या नंदिनी नाम से जाना जाता था। जमदग्नि ऋषि के पास भी एक कामधेनु थी, जिसके बल पर उन्होंने हैहयराज का भव्य स्वागत किया था। ६०. कूटस्थ— 'कूटस्थ' शब्द के अर्थ हैं- सर्वोच्च स्थित, गूढ़ स्थित अथवा गुप्त रूप में स्थित, अन्तर्व्याप्त, अन्तर्यामी, परमेश्वर, जीवात्मा, सर्वोपरि स्थित, अचल, अविनाशी। न्याय दर्शन में परमेश्वर को कूटस्थ कहा गया है, जो जन्म- गुण से रहित है। सांख्य दर्शन की मान्यता के अनुसार कूटस्थ आत्मा-पुरुष है, जो परिमाणरहित है तथा जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में एक समान है, निर्लिप्त और द्रष्टा मात्र है। शाक्त परम्परा के अनुसार सर्वोच्च अन्तिम अवस्था में विष्णु या शिव एक ही परमात्मा है। केवल सृष्टिकाल में ये भिन्न होते हैं। कूटस्थ पुरुष जीवात्माओं का समष्टिगत रूप है। अव्यक्त पुरुष को भी कूटस्थ कहा गया है। जड़ प्रकृति के संसर्ग से परे अपने स्वरूप में स्थित मुक्त आत्मा कूटस्थ है। गीता के अनुसार इस लोक में क्षर और अक्षर दो प्रकार के पुरुष हैं। सब प्राणियों के शरीर तो क्षर हैं और कूटस्थ (आत्मा-पुरुष) अक्षर कहा जाता है-द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च/क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते (गी० १५.१६)। उपनिषद् ज्ञान के अनुसार ब्रह्मा से लेकर चींटी तक सब प्राणियों की बुद्धि में रहने वाला और उनके स्थूल-सूक्ष्म आदि देहों का नाश होने पर जो शेष रहा दिखाई देता है, वह कूटस्थ कहा जाता है-ब्रह्मादिपिपीलिकापर्यन्तं सर्वप्राणिबुद्धिष्वविशिष्टतयोपलभ्यमानः सर्वप्राणिबुद्धिस्थो यदा तदा कूटस्थ इत्युच्यते (स०सा० १०)। ६१. क्रतु— क्रतु शब्द के पर्याय कोश ग्रन्थों में यज्ञ, अश्वमेध, विवेक, प्रज्ञा, संकल्प, इच्छा आदि मिलते हैं। वह परम पुरुष क्रतुमय (संकल्पमय) ही है- अथ खलु क्रतुमयः पुरुषः (छान्दो० ३.१४.१)। उपनिषद् में लिखा है- छन्द, यज्ञ, क्रतु, (अग्निष्टोम आदि विशिष्ट यज्ञ कर्म), व्रत जो भी वेद वर्णित हैं, उनका अधिष्ठाता वह मायावी पुरुष है- छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति। अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः (श्वेता० ४.९)। वह परम पुरुष सम्पूर्ण क्रतुओं द्वारा यजन किया जाता है- स सर्वैः क्रतुभिर्यजते (अव्यक्तो० ७.१)। ६२. क्षेत्रज्ञ— शरीर रूपी क्षेत्र का ज्ञाता, सर्वसाक्षी अथवा जीवात्मा के अर्थ में क्षेत्रज्ञ शब्द प्रयुक्त हुआ है। शरीर के अधिष्ठाता, आत्मा अथवा परमात्मा के पर्याय रूप में भी क्षेत्रज्ञ प्रयुक्त हुआ है। उपनिषद् के अनुसार शरीर में जो प्रकाशमान चैतन्य स्वरूप है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है- तत्र यत् प्रकाशते चैतन्यं स क्षेत्रज्ञ इत्युच्यते (स०सा० ८) उस परमात्मा का अंश ही सब चेतन, प्राणियों में जीवात्मा बना है। वही प्रत्येक शरीर में क्षेत्रज्ञ रूप में विद्यमान है- अस्यांशोऽयं यश्चेतनमात्रः प्रतिपुरुषं क्षेत्रज्ञः (मैत्रा० २.५)। यही क्षेत्रज्ञ लिङ्ग शरीर में संकल्प, अभिमान तथा अध्यवसाय के रूप में प्रतिष्ठित है। यह विशुद्ध, नित्य, मुक्त, असंग तथा प्रजापति रूप है। गीता में भगवान् कहते हैं- यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है, इसे जानने वाले को तत्त्वज्ञाता, विद्वान्, क्षेत्रज्ञ कहते हैं। सब क्षेत्रों का मुझे ही क्षेत्रज्ञ जान। क्षेत्र क्षेत्रज्ञ के भेद का जो ज्ञान है, वही यथार्थ ज्ञान है-इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम (गी० १३.१-२)। शरीर रूपी क्षेत्र का पूरा-पूरा ज्ञान रखने वाला तथा इसका अधिकारी ही क्षेत्रज्ञ है।