भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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गन्धर्व परिशिष्ट ४४५ ६३. गन्धर्व— देवों के एक भेद अथवा अर्धदेवों के रूप में गन्धवों को स्वीकार किया गया है। निरुक्त के अनुसार 'गा' या 'गो' की धारण करने वाला होने से इन्हें गन्धर्व कहा गया है। यहाँ 'गा' या 'गो' का भावार्थ पृथ्वी, किरण, वाणी इत्यादि ग्रहण किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि ये देवों के पास गाने वाले हैं, अतः वाणी या कण्ठ की धारण करने वाले हैं। वेदों में दो प्रकार के गन्धवों का उल्लेख हुआ है- एक द्युस्थानीय, दूसरे अन्तरिक्ष स्थानीय। द्युस्थानीय गन्धर्वों को दिव्य गन्धर्व कहा गया है। ये सोम के रक्षक, रोगों के चिकित्सक, सूर्य अश्वों के वाहक तथा स्वर्गीय ज्ञान प्रकाशक माने गये हैं। अन्तरिक्ष स्थानीय गन्धर्व नक्षत्रों के प्रवर्त्तक और सोम के रक्षक माने गये हैं। उपनिषद् तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में गन्धर्वों के दो भेद उल्लिखित हैं- देव गन्धर्व और मनुष्य गन्धर्व। शब्दार्थ चिन्तामणि में गन्धर्वों के दो भेद-दिव्य तथा मर्त्य वर्णित हुए हैं। अग्निपुराण में गन्धर्वों के बारह गण माने गये हैं- अभ्राज्य, अंधारि, रंभारि, सूर्यवर्चा, कृधु, हस्त, सुहस्त, स्वन्, मूर्धवान्, महामना, विश्वावसु और कृशानु। गंधर्वों का लोक गुह्यक लोक के ऊपर और विद्याधर लोक के नीचे वर्णित हुआ है। ६४. गायत्री— उपनिषद् के अनुसार तत्राणांस्तत्रे तद्यद्गयांस्तत्रे तस्माद्गायत्री (बृह० ५.१४.४); अर्थात् इसने प्राणों का त्राण किया, इसी से यह गायत्री है। 'गयान् (प्राणान्) त्रायते इति गायत्री' व्युत्पत्ति के अनुसार प्राणों का त्राण करने वाली शक्ति की गायत्री कहा गया है। इसीलिए गायत्री की प्राणोपासना भी कहा गया है। गायत्री को प्राणरूप में स्वीकार किया गया है- गायत्री वै प्राणः (शत०ब्रा० १.३.५.१५)। गायत्री को अग्नि, तेज और ब्रह्मवर्चस भी कहकर उपन्यस्त किया गया है- गायत्री वाऽग्निः (शत०ब्रा० १.८.२.१३), तेजो वै गायत्री (तै०सं० ३.२.९.३), गायत्री ब्रह्मवर्चसम् (मै०ब्रा० ४.३.१)। आठ-आठ अक्षरों के तीन पदों वाले छन्द को गायत्री छन्द कहा गया है। गायत्री को छन्दों में सर्वोत्तम माना गया है- गायत्री वै छन्दसामग्रं ज्यैष्ठ्यम् (जै०ब्रा० २.२२७)। त्रिकाल संध्या में इसी मंत्र के जप का विधान रहा है। गायत्री को ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों शक्तियों का रूप कहकर प्रतिपादित किया गया है- गायत्र्येव परो विष्णुर्गायत्र्येव परः शिवः। गायत्र्येव परो ब्रह्मा गायत्र्येव त्रयी ततः (स्कं० पु०काशी खं०पू०४.९.५८)। उपनिषद् का वर्णन है कि यह जो भी कुछ है, वस्तुतः वह गायत्री ही है- गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच (छान्दो० ३.१२.१) यह सम्पूर्ण पृथ्वी भी गायत्री ही है, जिसमें समस्त प्राणी प्रतिष्ठित हैं- या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिवी। अस्यां हीदं सर्वं भूतं प्रतिष्ठितम् (छान्दो० ३.१२.२)। गायत्री को वेदमाता, देवमाता तथा विश्वमाता कहा गया है। इनकी उपासना से व्यक्ति आयु, प्राण, प्रजा (सन्तान), पशु, कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति का अधिकारी बन जाता है- स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्। आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्। मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् (अथर्व० १९.७१.१)। ६५. गुरु-शिष्य- गायत्री मंत्र का उपदेष्टा गुरु कहलाता है। अध्यात्म विद्या या ब्रह्म विद्या प्रदान करने वाले आचार्य भी गुरु कहलाते हैं। गुरु जिस पुरुष की गायत्री या अन्य मन्त्र की दीक्षा देता है, वह शिष्य कहा जाता है। गुरु शिष्य परम्परा भारतवर्ष में अनादि काल से रही है। जिसका कोई गुरु नहीं होता था, उसे 'निगुरा' कहकर तिरस्कृत किया जाता था। गुरु सामान्य मनुष्यों के गृहस्थान से बहुत दूर एकान्त स्थान में जहाँ विद्यार्थियों को पढ़ाते थे- वह स्थान गुरुकुल कहा जाता था। गुरु तप-तितिक्षा द्वारा अपने व्यक्तित्व में प्रखरता-भारीपन या गुरुता के कारण यह प्रतिष्ठा पाता था। मनुस्मृति के अनुसार जो विप्र निषेक (गर्भाधान) आदि संस्कारों को यथाविधि कराता है और अन्न से पोषण करता है, वह गुरु कहलाता है- निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि। सम्भावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते। (म०स्मृ०२.१४२) इस परिभाषा से माता-पिता पहले गुरु हैं, फिर पुरोहित आदि। युक्तिकल्पतरु में अच्छे गुरु के अनेक लक्षण वर्णित हैं। चाणक्यनीति के अनुसार द्विजातियों के गुरु अग्नि, वर्णों के गुरु ब्राह्मण, स्त्रियों के गुरु पति और अतिथि सबके गुरु हैं- गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः। पतिरेको गुरुः स्त्रीणां सर्वेषामतिथिर्गुरुः (चा०नी०)। एक शिष्य के अन्दर सच्चे गुरु की प्राप्ति की जितनी उत्कंठा होती है, उससे कहीं अधिक एक गुरु के अन्दर सच्चे शिष्य की तलाश की व्याकुलता रहती है। अतः शिष्य की निरन्तर अपनी पात्रता के विकास का उद्यम करते रहना चाहिए। गुरु ग्रन्थ साहिब के अनुसार चाहे सौ चाँद चढ़ आयें, चाहे सहस्र सूर्यों का उदय हो जाये, तो भी गुरु के बिना अँधेरा ही रहता है। उपनिषद् ज्ञान के अनुसार समस्त

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