भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 505 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 7

भूमिका

'वेद' का अर्थ 'बोध' या 'ज्ञान' है। विद्वानों ने संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद् इन चारों के संयोग को समग्र वेद कहा है। उपनिषद् को वेद का शीर्ष भाग कहा गया है, वेदान्त कहा गया है; क्योंकि यह वेदों का अन्तिम (सर्वश्रेष्ठ) भाग है। भार- तीय दर्शन जगत् में प्रसिद्ध 'प्रस्थान-त्रयी' के उपनिषद् आदिम ग्रन्थ हैं तथा अन्य दोनों गीता और ब्रह्मसूत्र के उपजीव्य (आश्रयीभूत)। इसे आध्यात्मिक मानसरोवर कहा जा सकता है, जिससे विनिःसृत ज्ञान की सरिताएँ इस पुण्य भूमि में मानव मात्र के अभ्युदय (भौतिक उन्नति) एवं निःश्रेयस (आध्यात्मिक कल्याण) के लिए प्रवहमान हैं। 'उपनिषद्' का भाव- इसमें 'उप' और 'नि' उपसर्ग हैं। 'सद्' धातु 'गति' के अर्थ में प्रयुक्त होती है। 'गति' शब्द का उपयोग ज्ञान, गमन और प्राप्ति इन तीन संदर्भों में होता है। यहाँ प्राप्ति अर्थ अधिक उपयुक्त है। '"उप सामीप्येन, नि- नितरां, प्राप्नुवन्ति परं ब्रह्म यया विद्यया सा उपनिषद्।" अर्थात् जिस विद्या के द्वारा परब्रह्म का सामीप्य एवं तादात्म्य प्राप्त किया जाता है, वह 'उपनिषद्' है। दूसरे शब्दों में 'उप' + 'नि' इन दो उपसर्गों के साथ 'सद्' धातु से 'क्विप्' प्रत्यय के प्रयोग से 'उपनिषद्' शब्द बना है। 'सद्' धातु के तीन अर्थ मान्य हैं- (१) विशरण (विनाश) (२) गति (ज्ञान और प्राप्ति) (३) अवसादन (शिथिल करना), इस आधार पर 'उपनिषद्' का अर्थ हुआ-"जो पाप- ताप का नाश करे, सच्चा ज्ञान प्रदान करे, आत्मा की प्राप्ति कराये और अज्ञान- अविद्या को शिथिल करे, वह उपनिषद् है।" अष्टाध्यायी (१.४.७९) में जीविकोपनिषदा- वौपम्ये सूत्रानुसार उपनिषद् शब्द परोक्ष या रहस्य के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। कौटिल्य के अर्थ-शास्त्र में युद्ध काल के गुप्त प्रयोगों की चर्चा में औपनिषद प्रयोग शब्द व्यवहृत हुआ है। इससे यह प्रकट होता है कि उपनिषद् का तात्पर्य रहस्य भी है। अमरकोष (३. ९९) में भी आता है-"धर्मे रहस्युपनिषत् स्यात्" अर्थात् उपनिषद् शब्द गूढ़ धर्म एवं रहस्य के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इस आधार पर उपनिषद् को परोक्ष या रहस्यमय ज्ञान के स्रोत भी कह सकते हैं। विद्वानों ने 'उपनिषद्' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार भी मानी है-उप (सामीप्य अथवा व्यवधान रहित), नि (विशिष्ट या सम्पूर्ण), सद् (ज्ञान या बोध) अर्थात् 'सामीप्य द्वारा प्राप्त विशिष्ट बोध अथवा व्यवधान रहित सम्पूर्ण ज्ञान।' उपनिषदों में जिस ज्ञान की अभिव्यक्ति हुई है, उसे निश्चित रूप से उक्त विशेषणों से युक्त कहा जा सकता है। एक मत यह भी है-'उपनिषद्यते प्राप्यते ब्रह्मात्मभावोऽनया इति उपनिषद्।' जिससे ब्रह्म का साक्षात्कार किया जा सके, वह उपनिषद् है। तात्पर्य यह है कि उपनिषदों में ब्रह्मज्ञान का ही प्रधानता से विवेचन हुआ है, जिससे उपनिषदों को अध्यात्म विद्या भी कहा जाता हैं। ब्रह्मज्ञान, आत्मज्ञान, तत्त्वज्ञान और ब्रह्मविद्या-ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने उपनिषदों की महत्ता मुक्त कंठ से स्वीकार की है।