१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९८ छान्दोग्योपनिषद् आदित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ ७ ॥ तब उषस्ति ऋषि ने उत्तर दिया- वह देवता आदित्य है; क्योंकि ये सम्पूर्ण प्राणी उदीयमान सूर्य का ही गान करते हैं। यही देव उद्गीथ से सम्बन्धित है। यदि आप उसे बिना जाने स्तुति करते, तो मेरे वचन के अनुसार आपका सिर निश्चय ही गिर जाता ॥ ७ ॥ अथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रति- हरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥ ८ ॥ उसके बाद प्रतिहर्ता उनके पास आये और कहने लगे- हे भगवन् ! आपने मुझसे कहा था कि हे प्रतिहर्तः ! आप जिस देवता का प्रतिहरण करते हैं, उसे बिना जाने यदि प्रतिहरण करेंगे, तो आपका सिर गिर जायेगा। अब आप बताएँ कि वह देवता कौन सा है ? ॥ ८ ॥ अन्नमिति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रत्यहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ९ ॥ इस पर उन्होंने कहा- वह देवता अन्न है, क्योंकि सम्पूर्ण प्राणी अन्न को ग्रहण करते हुए ही जीते हैं। अन्न देवता ही इस प्रतिहरण से सम्बंधित हैं। यदि उसे आप बिना जाने ही प्रतिहरण करते, तो मेरे वचन के अनुसार आपका मस्तक गिर जाता ॥ ९ ॥ ॥ द्वादशः खण्डः ॥ इस खण्ड में शौव उद्गीथ का वर्णन है। कोश ग्रन्थों के अनुसार 'शौव' शब्द 'शौवन' का संक्षिप्त रूप है। शौवन का अर्थ होता है श्वान से सम्बंधित। यह आलंकारिक उपाख्यान है। 'श्वान' शब्द श्वन् धातु से बना है; शुन- गतौ के अनुसार श्वान का अर्थ गतिशील होता है। यहाँ 'शौव' का अर्थ प्राण से सम्बन्धित मानने से ही उपाख्यान का भाव स्पष्ट होता है। वर्णित कथानुसार ऋषि पुत्र स्वाध्याय के लिए प्राकृतिक स्थल पर गये हैं। वहाँ श्वेत (निर्मल-निर्दोष) श्वान (प्राण प्रवाह) का उन्हें साक्षात्कार होता है। अन्य श्वान (इन्द्रियादि के विकारों से ग्रस्त प्राण) अपनी भूख का हवाला देकर उनसे अन्न के लिए उद्गीथ का गान करने को कहते हैं। पूर्व खण्डों में कहा जा चुका है; शुद्ध प्राण को ही उद्गीथ साधना फलित होती है। वे प्रकृति में संव्याप्त प्राण समूह शुद्ध प्राण के नेतृत्व में उद्गीथ का गान करते हैं। इस प्रसंग में यहाँ वर्णित उपाख्यान का भाव सिद्ध होता है- अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वव्राज ॥ १ ॥ अब शौव (प्राणों से सम्बन्धित) उद्गीथ का वर्णन करते हैं। बक दाल्भ्य अथवा ग्लाव मैत्रेय स्वाध्याय के लिए जलाशय के समीप गये ॥ १ ॥ तस्मै श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ॥ २ ॥ उनके समीप श्वेत (निर्मल-निर्विकार) श्वान (प्राण की इकाई) का प्राकट्य हुआ। उसके पास कुछ अन्य श्वान (विकारग्रस्त प्राण समूह) आकर कहने लगे; आप हमारे निमित्त अन्न प्राप्ति के लिए उद्गीथ का गान करें, हम सब भूखे हैं ॥ २ ॥